'कथक क्वीन' जयंती माला मिश्रा को पद्मश्री दिलाने की मांग तेज, बिहार के जनप्रतिनिधियों से भी उठी पहल की अपील
जयंती माला मिश्रा कथक जगत में "कथक क्वीन" के नाम से जानी जाती हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ, जबकि विवाह के बाद उनका संबंध बिहार के भागलपुर जिले के बिहपुर क्षेत्र से जुड़ा। वर्तमान में वे मुंबई में रहकर भारतीय शास्त्रीय कथक के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में सक्रिय हैं।
पद्मश्री सम्मान की मांग क्यों हुई तेज?
समर्थकों के अनुसार, महाराष्ट्र के वरिष्ठ भाजपा नेता और बल्लारपुर से विधायक सुधीर मुनगंटीवार ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर जयंती माला मिश्रा के नाम पर पद्मश्री सम्मान के लिए विचार करने का अनुरोध किया है।
इसी के बाद एक बार फिर उनके नाम को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि भारत सरकार की ओर से इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक घोषणा या निर्णय सामने नहीं आया है।
समर्थकों का मानना है कि जिस तरह महाराष्ट्र के जनप्रतिनिधि उनके नाम की अनुशंसा कर रहे हैं, उसी तरह बिहार के जनप्रतिनिधियों को भी आगे आना चाहिए।
60 वर्षों से कथक साधना में सक्रिय
जयंती माला मिश्रा के समर्थकों का दावा है कि वे लगभग 60 वर्षों से कथक साधना कर रही हैं।
वे केवल मंचीय प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और आंगनवाड़ी के बच्चों को भी निःशुल्क कथक प्रशिक्षण देती रही हैं।
उनकी इस पहल को भारतीय शास्त्रीय कला के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास माना जाता है।
बनारस घराने की परंपरा से जुड़ा है नाम
जयंती माला मिश्रा स्वयं को बनारस घराने की 10वीं पीढ़ी की कथक साधिका बताती हैं।
उनके अनुसार उनकी कला परंपरा महर्षि भरद्वाज की वैदिक परंपरा तथा आचार्य सुखदेव महाराज की परंपरा से जुड़ी है।
उन्होंने भारत के साथ-साथ कई देशों में कथक प्रस्तुतियां देकर भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने का प्रयास किया है।
उनका कहना है कि आज उनके अनेक शिष्य भारत और विदेशों में कथक अकादमियां संचालित कर नई पीढ़ी को इस शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा दे रहे हैं।
परिवार के कई कलाकार राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित
जयंती माला मिश्रा का कहना है कि उनके परिवार की कई प्रतिष्ठित विभूतियों को पहले ही राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं।
उनके अनुसार उनकी माता स्वर्गीय सितारा देवी को पद्मश्री, गोपीकृष्ण को पद्मश्री, पंडित किशन महाराज को पद्मभूषण तथा पंडित शांता प्रसाद को पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है।
उनका मानना है कि उनके परिवार ने भारतीय शास्त्रीय कला को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
पिछले 15 वर्षों से कर रही हैं प्रयास
जयंती माला मिश्रा का कहना है कि वे पिछले लगभग 15 वर्षों से पद्मश्री सम्मान के लिए आवेदन कर रही हैं।
उनके अनुसार महाराष्ट्र सरकार के संस्कृति विभाग, मंत्रालय और राजभवन स्तर से समय-समय पर उन्हें सहयोग मिलता रहा है।
उन्होंने यह भी बताया कि उनकी कथक अकादमियां मुंबई, वाराणसी, भागलपुर सहित अन्य शहरों और विदेशों में भी संचालित हैं।
कला के सम्मान को लेकर क्या कहा?
बेगूसराय और खगड़िया के एक निजी कार्यक्रम के दौरान जयंती माला मिश्रा ने कला प्रेमियों से बातचीत में कहा था कि एक सच्चे कलाकार के लिए पद्मश्री सम्मान का विशेष महत्व होता है।
उनका मानना है कि कलाकारों की वर्षों की साधना का सम्मान होना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी भारतीय शास्त्रीय कला और संस्कृति से प्रेरणा ले सके।
बिहार के जनप्रतिनिधियों से क्या अपील की गई?
समर्थकों ने भागलपुर, बिहपुर, बेगूसराय और खगड़िया क्षेत्र के सांसदों तथा विधायकों से अपील की है कि वे भारत सरकार के समक्ष जयंती माला मिश्रा के नाम की अनुशंसा करें।
उनका कहना है कि जयंती माला मिश्रा बिहार की बहू हैं और यदि उन्हें पद्मश्री सम्मान मिलता है तो यह केवल एक कलाकार का सम्मान नहीं होगा, बल्कि बिहार और भारतीय शास्त्रीय कथक परंपरा के लिए भी गौरव का विषय बनेगा।
हालांकि पद्म पुरस्कारों का अंतिम निर्णय केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही लिया जाता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मांग?
भारतीय शास्त्रीय नृत्य की परंपरा को जीवित रखने वाले कलाकारों को राष्ट्रीय सम्मान मिलने से कला और संस्कृति को नई पहचान मिलती है।
समर्थकों का मानना है कि यदि जयंती माला मिश्रा को पद्मश्री सम्मान मिलता है तो इससे कथक की नई पीढ़ी को भी प्रेरणा मिलेगी और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का संदेश जाएगा।