102 साल जिए, 4 सेंट्रल जेलों में रहे कैद; फिर भी नहीं ली पेंशन, जानिए ब्रह्मदेव चौधरी की गाथा


 

Freedom Fighter Brahmdev Chaudhary भारत के उन गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल हैं, जिनका योगदान देश की आजादी की लड़ाई में बेहद महत्वपूर्ण रहा। Freedom Fighter Brahmdev Chaudhary ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया, वर्षों तक जेल में यातनाएं झेलीं और आजादी मिलने के बाद भी कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। सबसे खास बात यह रही कि स्वतंत्रता के बाद सरकार द्वारा दी गई स्वतंत्रता सेनानी पेंशन को भी उन्होंने यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया कि मातृभूमि की सेवा उनका कर्तव्य था, उसका कोई मूल्य नहीं हो सकता।

खगड़िया और बेगूसराय क्षेत्र से जुड़े ब्रह्मदेव चौधरी का जीवन त्याग, साहस और राष्ट्रभक्ति का ऐसा उदाहरण है, जिसे आज भी स्थानीय लोग गर्व के साथ याद करते हैं। उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर अधिक पहचान दिलाने की मांग लगातार उठती रही है।

भारत छोड़ो आंदोलन में निभाई अहम भूमिका

साल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रह्मदेव चौधरी अंग्रेजी शासन के खिलाफ सक्रिय रूप से आंदोलन का हिस्सा बने।

बताया जाता है कि वे अपने साथियों के साथ अंग्रेजों की मालगाड़ियों, जल परिवहन और सरकारी संसाधनों को निशाना बनाकर स्वतंत्रता आंदोलन के लिए धन, हथियार और अन्य जरूरी संसाधन जुटाने में सहयोग करते थे। उनकी गतिविधियों से ब्रिटिश प्रशासन काफी परेशान था और उन्हें पकड़ने के लिए विशेष अभियान चलाया गया।

घर पर छापा, माता-पिता गिरफ्तार, फिर भी नहीं झुके

ब्रिटिश प्रशासन ने उनके संसारपुर स्थित घर पर छापेमारी की, जहां से 47 बंदूकें बरामद होने का दावा किया गया।

दबाव बनाने के लिए अंग्रेज अधिकारियों ने उनके माता-पिता को भी गिरफ्तार कर लिया। इसकी जानकारी मिलने पर ब्रह्मदेव चौधरी स्वयं अधिकारियों के सामने उपस्थित हुए, लेकिन उन्होंने अपने किसी भी साथी की जानकारी साझा नहीं की।

कहा जाता है कि हिरासत के दौरान उन्हें 11 दिनों तक कठोर यातनाएं दी गईं, फिर भी उन्होंने अपने साथियों या आंदोलन से जुड़ी गोपनीय जानकारी उजागर नहीं की।

चार सेंट्रल जेलों में काटी लंबी कैद

ब्रिटिश सरकार ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई और अपर डिवीजन बंदी का दर्जा दिया।

उन्हें अलग-अलग समय पर भागलपुर सेंट्रल जेल, हजारीबाग सेंट्रल जेल, बक्सर सेंट्रल जेल और मुजफ्फरपुर सेंट्रल जेल में रखा गया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था के बीच उन्हें समय-समय पर परिवार से मिलने की अनुमति भी दी जाती थी।

उनका जेल जीवन केवल सजा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष का प्रतीक माना जाता है।

महात्मा गांधी ने भी परिवार का जाना हाल

स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, ब्रह्मदेव चौधरी के संघर्ष और उनके परिवार की कठिन परिस्थितियों की जानकारी मिलने पर महात्मा गांधी ने उनके परिजनों से मुलाकात कर उनका हालचाल जाना और सहायता की पहल की।

हालांकि इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक अभिलेख सीमित उपलब्ध हैं, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर यह प्रसंग लंबे समय से सुनाया जाता रहा है।

आजादी के बाद पेंशन लेने से कर दिया इनकार

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी पेंशन देने का प्रस्ताव दिया।

लेकिन ब्रह्मदेव चौधरी ने इसे स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि देश की सेवा उनका कर्तव्य था और उसके बदले किसी प्रकार का लाभ लेना उचित नहीं होगा। उनका यह निर्णय आज भी निस्वार्थ राष्ट्रसेवा की मिसाल माना जाता है।

102 वर्ष की आयु तक बने रहे प्रेरणा

वर्ष 1900 में जन्मे ब्रह्मदेव चौधरी का 22 मई 2002 को 102 वर्ष की आयु में निधन हुआ।

आज भी खगड़िया, बेगूसराय और आसपास के क्षेत्रों में लोग उनके योगदान को सम्मान के साथ याद करते हैं। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों की मांग है कि उनके जीवन और स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर उचित स्थान मिले तथा नई पीढ़ी को उनके संघर्ष से परिचित कराया जाए।

क्यों याद किए जाते हैं ब्रह्मदेव चौधरी?

ब्रह्मदेव चौधरी का जीवन केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की कहानी नहीं, बल्कि देशभक्ति, त्याग और सिद्धांतों पर अडिग रहने की प्रेरणा भी है।

उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने साथियों का साथ नहीं छोड़ा, अंग्रेजी शासन का डटकर सामना किया और स्वतंत्रता के बाद भी निजी लाभ से ऊपर राष्ट्रहित को रखा। यही कारण है कि उन्हें आज भी गुमनाम नायकों में एक विशेष स्थान दिया जाता है।

 मुख्य बातें

  • ब्रह्मदेव चौधरी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
  • अंग्रेजी सरकार ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी।
  • वे भागलपुर, हजारीबाग, बक्सर और मुजफ्फरपुर सेंट्रल जेल में रहे।
  • स्वतंत्रता के बाद उन्होंने सरकारी स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेने से इनकार कर दिया।
  • स्थानीय लोग उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाने की मांग कर रहे हैं।
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