आइटम नंबर की शुरुआत किसने की? जानिए बॉलीवुड के पहले डांस नंबर की कहानी


 Item Number History को लेकर लोगों में हमेशा उत्सुकता रही है। Item Number History की शुरुआत आज के दौर के लोकप्रिय गानों से नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा के शुरुआती वर्षों से जुड़ी हुई है। समय के साथ फिल्मों में ऐसे विशेष डांस नंबर शामिल किए जाने लगे, जिनका कहानी से सीधा संबंध नहीं होता था, लेकिन वे दर्शकों को आकर्षित करने का बड़ा माध्यम बन गए। आज 'ऊ अंटावा', 'मुन्नी बदनाम', 'शीला की जवानी' और 'लैला मैं लैला' जैसे गाने इसी परंपरा का हिस्सा माने जाते हैं।

हालांकि, इन गानों को आज भले ही "आइटम नंबर" कहा जाता हो, लेकिन इस ट्रेंड की शुरुआत कई दशक पहले हुई थी। आइए जानते हैं कि बॉलीवुड में पहला सोलो डांस किसने किया और "आइटम नंबर" शब्द आखिर कब प्रचलन में आया।

बॉलीवुड की पहली सोलो डांस परफॉर्मर कौन थीं?

हिंदी सिनेमा में स्टैंडअलोन डांस परफॉर्मेंस की शुरुआत का श्रेय एना मैरी गेजेलर, जिन्हें अजूरी (मैडम अजूरी) के नाम से जाना जाता था, को दिया जाता है।

1930 के दशक में उन्होंने फिल्मों में ऐसे डांस प्रस्तुत किए, जो मुख्य कहानी से अलग होते हुए भी दर्शकों का ध्यान खींचते थे। उन्होंने भारतीय, बंगाली और पाकिस्तानी फिल्मों में भी काम किया।

हालांकि, उस दौर के वीडियो रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन फिल्म इतिहास में उन्हें शुरुआती सोलो डांस कलाकारों में गिना जाता है।

कुकू मोरे ने बदला डांस नंबर का दौर

अजूरी के बाद 1940 और 1950 के दशक में कुकू मोरे ने हिंदी फिल्मों में डांस नंबर को नई पहचान दी।

उन्हें बॉलीवुड की पहली लोकप्रिय कैबरे डांसर माना जाता है। अपनी लचीली डांस शैली की वजह से उन्हें 'रबर गर्ल' भी कहा जाता था।

उनके कई डांस नंबर दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए। फिल्म बरसात का 'पतली कमर है' और चलती का नाम गाड़ी का 'हम तुम्हारे हैं जरा' जैसे गीत आज भी याद किए जाते हैं।

फिल्म इतिहास में कुकू का एक और बड़ा योगदान यह माना जाता है कि उन्होंने आगे चलकर हेलेन के लिए बॉलीवुड में रास्ता बनाया।


हेलेन ने डांस नंबर को बनाया नई पहचान

कुकू मोरे के बाद हेलेन ने हिंदी सिनेमा में स्पेशल डांस नंबरों को नई ऊंचाई दी।

उनके डांस स्टाइल, एक्सप्रेशन और स्क्रीन प्रेजेंस ने उन्हें बॉलीवुड की सबसे चर्चित डांस कलाकारों में शामिल कर दिया।

'मेरा नाम चिन चिन चू', 'पिया तू अब तो आजा' और 'महबूबा महबूबा' जैसे गाने आज भी हिंदी सिनेमा के यादगार डांस नंबरों में गिने जाते हैं।

हेलेन के दौर के बाद फिल्मों में विशेष डांस गीतों की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई और यह ट्रेंड मुख्यधारा की फिल्मों का अहम हिस्सा बन गया।

'आइटम नंबर' शब्द पहली बार कब इस्तेमाल हुआ?

दिलचस्प बात यह है कि फिल्मों में स्पेशल डांस नंबर पहले से मौजूद थे, लेकिन "आइटम नंबर" शब्द का इस्तेमाल काफी बाद में शुरू हुआ।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्ष 1999 में रिलीज हुई फिल्म 'शूल' के गीत 'मैं आई हूं यूपी बिहार लूटने' को पहली बार सार्वजनिक रूप से "आइटम नंबर" कहा गया।

इसके बाद यह शब्द धीरे-धीरे फिल्म उद्योग और दर्शकों के बीच लोकप्रिय हो गया। आने वाले वर्षों में कई फिल्मों में ऐसे गाने शामिल किए गए, जिन्हें प्रमोशन और मनोरंजन के प्रमुख आकर्षण के रूप में पेश किया गया।

आज भी फिल्मों का अहम हिस्सा हैं स्पेशल डांस नंबर

आज के दौर में भी कई बड़ी फिल्मों में कहानी से अलग एक विशेष डांस गीत शामिल किया जाता है। इन गानों का उद्देश्य फिल्म के प्रचार को बढ़ाना और दर्शकों को आकर्षित करना होता है।

हालांकि, समय के साथ ऐसे गीतों की प्रस्तुति, संगीत और फिल्मांकन में काफी बदलाव आया है। अब कई फिल्मों में इन्हें कहानी का हिस्सा बनाने की भी कोशिश की जाती है।

फिल्म विशेषज्ञों का मानना है कि स्पेशल डांस नंबरों ने भारतीय सिनेमा की लोकप्रिय संस्कृति को अलग पहचान दी है और कई कलाकारों के करियर को नई दिशा भी दी है।

क्या है इस ट्रेंड की सबसे बड़ी खासियत?

बॉलीवुड के स्पेशल डांस नंबरों का इतिहास लगभग एक सदी पुराना माना जाता है। अजूरी से शुरू हुआ यह सफर कुकू मोरे और हेलेन जैसे कलाकारों से होता हुआ आज के आधुनिक सिनेमा तक पहुंच चुका है।

भले ही "आइटम नंबर" शब्द 1999 के बाद लोकप्रिय हुआ हो, लेकिन फिल्मों में दर्शकों का मनोरंजन करने वाले विशेष डांस गीत हिंदी सिनेमा की परंपरा का हिस्सा कई दशक पहले ही बन चुके थे।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1