BRA Bihar University में ध्वनितत्त्व पर व्याख्यान, संस्कृत काव्यशास्त्र के गूढ़ रहस्यों पर हुई चर्चा


 

BRA Bihar University के संस्कृत विभाग में ध्वनितत्त्व विषय पर आयोजित मासिक व्याख्यान में संस्कृत व्याकरण और काव्यशास्त्र के महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर विस्तार से चर्चा की गई। BRA Bihar University के इस शैक्षणिक कार्यक्रम में शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। व्याख्यान का मुख्य उद्देश्य ध्वनि-सिद्धांत, भाषा की अभिव्यक्ति और भारतीय काव्यशास्त्र में उसके महत्व को सरल और व्यावहारिक तरीके से समझाना था।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. श्यामबाबू शर्मा ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में सेवानिवृत्त प्राध्यापक प्रो. श्रीप्रकाश पाण्डेय ने अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मनीष कुमार झा ने किया।

ध्वनि-सिद्धांत की मूल अवधारणा पर हुई चर्चा

कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. निभा शर्मा के विषय-प्रवर्तन से हुई।

उन्होंने आचार्य आनन्दवर्धन के प्रसिद्ध ध्वनि-सिद्धांत की मूल अवधारणा को समझाते हुए कहा कि ध्वनि को भारतीय काव्यशास्त्र में काव्य की आत्मा माना गया है।

उन्होंने ध्वन्यालोक में वर्णित रसध्वनि, वस्तुध्वनि और अलंकारध्वनि के स्वरूप और महत्व पर भी प्रकाश डाला, जिससे विद्यार्थियों को विषय की मूलभूत समझ विकसित हो सके।

मुख्य वक्ता ने ध्वनितत्त्व के विभिन्न आयाम समझाए

मुख्य वक्ता प्रो. श्रीप्रकाश पाण्डेय ने अपने व्याख्यान में संस्कृत व्याकरण और काव्यशास्त्र के संदर्भ में ध्वनितत्त्व का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया।

उन्होंने स्फोट, नाद, वर्ण और ध्वनि के पारस्परिक संबंधों को स्पष्ट करते हुए बताया कि व्याकरणशास्त्र में ध्वनि की अवधारणा और काव्यशास्त्र में ध्वनि का अर्थ अलग-अलग संदर्भों में समझा जाता है।

उन्होंने कहा कि भाषा केवल अर्थ व्यक्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि ध्वनि के माध्यम से भाव, रस और सौंदर्य का भी प्रभावी संप्रेषण करती है।

व्याकरण और काव्यशास्त्र के अंतर को किया स्पष्ट

व्याख्यान के दौरान प्रो. पाण्डेय ने बताया कि व्याकरणशास्त्र में ध्वनि भाषा की आधारभूत इकाई मानी जाती है।

वहीं काव्यशास्त्र में यही ध्वनि व्यंजना-शक्ति के माध्यम से काव्य की आत्मा बन जाती है और पाठक या श्रोता तक गहरे भावों का संप्रेषण करती है।

उन्होंने कई शास्त्रीय उदाहरणों के माध्यम से ध्वनितत्त्व की दार्शनिक पृष्ठभूमि और भारतीय साहित्य में उसके महत्व को सरल भाषा में समझाया।

विद्यार्थियों और शोधार्थियों को मिला शोध का नया दृष्टिकोण

अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. श्यामबाबू शर्मा ने कहा कि ध्वनितत्त्व का अध्ययन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना प्राचीन काल में था।

उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को संस्कृत व्याकरण और भारतीय काव्यशास्त्र पर गहन अध्ययन एवं अनुसंधान के लिए प्रेरित किया।

कार्यक्रम में उपस्थित प्रतिभागियों ने भी विषय को समकालीन शोध और भाषा अध्ययन के लिए उपयोगी बताया।

प्रश्नोत्तर सत्र में विशेषज्ञों ने दिए विस्तृत उत्तर

व्याख्यान के बाद प्रश्नोत्तर सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने ध्वनि-सिद्धांत, व्यंजना, स्फोट तथा काव्यशास्त्र से जुड़े कई प्रश्न पूछे।

मुख्य वक्ता ने सभी प्रश्नों का शास्त्रीय संदर्भों के साथ विस्तारपूर्वक उत्तर दिया।

कार्यक्रम में लंगट सिंह महाविद्यालय, एमडीडीएम महाविद्यालय, आरबीबीएम महाविद्यालय और अन्य संस्थानों के प्राध्यापक, शोधार्थी तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

अंत में डॉ. संगीता अग्रवाल ने सभी अतिथियों, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

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