बिहार पंचायत चुनाव पर बड़ा अपडेट, पहले होगा परिसीमन फिर होगा मतदान
बिहार पंचायत चुनाव को लेकर बड़ा प्रशासनिक बदलाव सामने आया है। बिहार पंचायत चुनाव अब तय समय पर होने की संभावना कम मानी जा रही है, क्योंकि राज्य सरकार पंचायतों का नए सिरे से परिसीमन कराने की तैयारी कर रही है। इस प्रक्रिया की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग को दिए जाने की योजना है। परिसीमन पूरा होने के बाद ही पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी होने की संभावना है। सरकार इस संबंध में मानसून सत्र के दौरान आवश्यक प्रस्ताव भी ला सकती है।
यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो बिहार की पंचायत व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। पंचायतों की संख्या बढ़ने से स्थानीय प्रशासनिक ढांचा भी नए स्वरूप में सामने आएगा।
2011 की जनगणना के आधार पर होगा नया परिसीमन
राज्य सरकार ने पंचायतों के नए परिसीमन के लिए वर्ष 2011 की जनगणना को आधार बनाने का फैसला किया है।
इससे पहले राज्य में पंचायतों का परिसीमन वर्ष 1991 की जनगणना के आधार पर किया गया था। उस समय पूरी प्रक्रिया पूरी होने में लगभग दो वर्ष लगे थे। इस बार भी परिसीमन एक विस्तृत प्रशासनिक प्रक्रिया होगी, जिसमें सभी जिलों की भागीदारी रहेगी।
सरकार का उद्देश्य वर्तमान जनसंख्या के अनुरूप पंचायतों की सीमाओं का पुनर्गठन करना है, ताकि स्थानीय प्रशासन अधिक प्रभावी बन सके।
बढ़ सकती है पंचायतों की संख्या
पिछले परिसीमन के बाद बिहार में कुल 8,053 ग्राम पंचायतों का गठन हुआ था।
इस बार संभावना जताई जा रही है कि पंचायतों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। चर्चा है कि जिन पंचायतों की आबादी 8,000 से अधिक है, उन्हें विभाजित कर नई पंचायतें बनाई जाएंगी।
यदि ऐसा होता है तो कई गांवों को नई पंचायतों का दर्जा मिलेगा और स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक सुविधाओं का विस्तार होगा।
जनसंख्या के अनुसार तय होगी पंचायतों की संरचना
वर्तमान नियमों के अनुसार लगभग 7,000 की आबादी पर एक ग्राम पंचायत, 5,000 की आबादी पर पंचायत समिति क्षेत्र तथा 500 की आबादी पर एक वार्ड का गठन किया जाता है।
इसी तरह लगभग 50,000 की जनसंख्या पर एक जिला परिषद क्षेत्र निर्धारित होता है। प्रत्येक ग्राम पंचायत में अधिकतम 14 वार्ड बनाए जा सकते हैं।
नई परिसीमन प्रक्रिया में इन्हीं मानकों को ध्यान में रखते हुए पंचायतों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाएगा।
प्राकृतिक सीमाओं को मिलेगी प्राथमिकता
सरकार ने सीमांकन के लिए प्राकृतिक भौगोलिक संरचनाओं को प्राथमिक आधार बनाने की योजना तैयार की है।
नई पंचायतों की सीमा तय करते समय नदी, नहर, झील, जंगल और पहाड़ जैसी प्राकृतिक सीमाओं को प्राथमिकता दी जाएगी।
जहां ऐसी प्राकृतिक सीमाएं उपलब्ध नहीं होंगी, वहां सड़क, पगडंडी, स्कूल, अस्पताल, मंदिर, मस्जिद, श्मशान या कब्रिस्तान जैसी स्थायी पहचान को सीमा निर्धारण का आधार बनाया जाएगा।
इसका उद्देश्य पंचायतों की सीमाओं को अधिक व्यावहारिक और विवाद रहित बनाना है।
जिलाधिकारियों की होगी अहम जिम्मेदारी
परिसीमन की पूरी प्रक्रिया में संबंधित जिलों के जिलाधिकारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
जिला निर्वाचन पदाधिकारी के रूप में वे पंचायतों की सीमाओं का निर्धारण, प्रारंभिक प्रस्ताव तैयार कराने, आपत्तियों की सुनवाई और अंतिम सूची तैयार कराने जैसी जिम्मेदारियां निभाएंगे।
राज्य निर्वाचन आयोग पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगा और अंतिम मंजूरी के बाद ही नई पंचायतों की अधिसूचना जारी की जाएगी।
चुनाव में क्यों हो सकती है देरी?
परिसीमन एक विस्तृत और समय लेने वाली प्रक्रिया होती है। इसमें पंचायतों की सीमा निर्धारण, जनसंख्या का विश्लेषण, प्रारूप प्रकाशित करना, आपत्तियों का निस्तारण और अंतिम अधिसूचना जारी करने जैसे कई चरण शामिल होते हैं।
इसी कारण माना जा रहा है कि परिसीमन पूरा होने तक पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं होगा।
हालांकि सरकार की ओर से अभी चुनाव की नई तिथि की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। अंतिम निर्णय परिसीमन प्रक्रिया की प्रगति और निर्वाचन आयोग की तैयारियों के आधार पर लिया जाएगा।
क्या होगा इसका असर?
यदि नई व्यवस्था लागू होती है तो पंचायतों की संख्या बढ़ने के साथ स्थानीय प्रतिनिधित्व भी बढ़ सकता है। बड़ी आबादी वाली पंचायतों का विभाजन होने से प्रशासनिक कार्यों में सुविधा मिलने की उम्मीद है।
साथ ही नई सीमाओं के कारण ग्रामीण विकास योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन और स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार मानसून सत्र में परिसीमन से जुड़ा प्रस्ताव कब लाती है और राज्य निर्वाचन आयोग इस प्रक्रिया को किस समयसीमा में पूरा करता है।
