Bihar: क्या फिर जेल जाएंगे आनंद मोहन? सुप्रीम कोर्ट ने रिहाई पर उठाए सख्त सवाल
आनंद मोहन सुप्रीम कोर्ट फैसला मामले ने एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी हलकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। आनंद मोहन सुप्रीम कोर्ट फैसला को लेकर गुरुवार को हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने समयपूर्व रिहाई पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि ड्यूटी पर तैनात किसी सरकारी अधिकारी की हत्या जैसे मामलों में समाज को गलत संदेश नहीं जाना चाहिए। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अंतिम निर्णय आने तक इस मामले पर सभी की नजरें टिकी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान क्या कहा?
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सुनवाई के दौरान पूछा कि ड्यूटी निभा रहे एक लोकसेवक की हत्या को गंभीर अपराध की श्रेणी में क्यों नहीं माना जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि ऐसे मामलों में दोषियों को समयपूर्व रिहाई का लाभ दिया जाता है, तो इससे समाज में गलत संदेश जा सकता है। कोर्ट ने इस पहलू पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
हालांकि, अदालत ने अभी कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है और फैसला सुरक्षित रखा है।
16 साल जेल में रहने के बाद 2023 में मिली थी रिहाई
आनंद मोहन को वर्ष 2007 में ट्रायल कोर्ट ने गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया हत्याकांड में दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई थी।
बाद में पटना हाईकोर्ट ने इस सजा को उम्रकैद में बदल दिया। वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
इसके बाद वर्ष 2023 में बिहार सरकार ने जेल नियमों में संशोधन किया। इसी बदलाव के आधार पर करीब 16 वर्ष जेल में रहने के बाद 27 अप्रैल 2023 को आनंद मोहन को समयपूर्व रिहाई का लाभ मिला।
रिहाई को सुप्रीम कोर्ट में क्यों दी गई चुनौती?
आनंद मोहन की रिहाई को दिवंगत आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
याचिका में कहा गया कि जिस नियम में संशोधन कर समयपूर्व रिहाई दी गई, उसकी वैधता पर सवाल उठते हैं। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में बिहार सरकार, राज्य सजा माफी बोर्ड, आनंद मोहन और याचिकाकर्ता की दलीलें सुनी गईं।
सभी पक्षों की सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है।
क्या फिर जेल जाना पड़ सकता है?
फिलहाल इस सवाल का स्पष्ट उत्तर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के बाद ही मिलेगा।
यदि अदालत यह मानती है कि समयपूर्व रिहाई नियमों के अनुरूप नहीं थी या संशोधन को कानूनी मान्यता नहीं मिलती, तो रिहाई पर प्रभाव पड़ सकता है। वहीं यदि अदालत रिहाई को वैध मानती है, तो वर्तमान स्थिति बनी रह सकती है।
इसलिए अभी किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
क्या था जी. कृष्णैया हत्याकांड?
यह मामला 5 दिसंबर 1994 का है।
उस समय गोपालगंज के जिलाधिकारी जी. कृष्णैया मुजफ्फरपुर से गुजर रहे थे। उसी दौरान एक गैंगस्टर के अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद उग्र भीड़ ने उनकी गाड़ी रोक ली और उन पर हमला कर दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
इस मामले में आनंद मोहन पर भीड़ को उकसाने और हिंसा के लिए जिम्मेदार होने का आरोप लगा। लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद उन्हें दोषी ठहराया गया।
जेल नियमों में बदलाव क्यों बना विवाद का कारण?
वर्ष 2023 में बिहार सरकार ने जेल मैनुअल 2012 के नियम 481(i)(a) में संशोधन किया।
पहले ड्यूटी पर तैनात लोकसेवक की हत्या के दोषियों को समयपूर्व रिहाई का लाभ नहीं मिल सकता था। संशोधन के बाद यह प्रतिबंध हटा दिया गया, जिससे ऐसे मामलों के दोषियों को भी सजा माफी और समयपूर्व रिहाई के लिए पात्र बनाया गया।
इसी संशोधन के आधार पर आनंद मोहन समेत 27 कैदियों को समयपूर्व रिहाई मिली। बाद में इसी संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है।
अब अदालत के अंतिम निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि समयपूर्व रिहाई को कानूनी रूप से सही माना जाता है या नहीं। फैसले के बाद ही आनंद मोहन की कानूनी स्थिति और इस मामले का भविष्य पूरी तरह स्पष्ट होगा।
