पटना/नई दिल्ली: दीपक प्रकाश मंत्री पद को लेकर बिहार की राजनीति में चर्चाएं तेज हैं। बिहार विधान परिषद चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनाए जाने के बाद दीपक प्रकाश मंत्री पद पर संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं। इसी बीच राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की है। इस मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई अटकलों को जन्म दे दिया है।
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एनडीए नेताओं की बैठक के दौरान उपेंद्र कुशवाहा ने प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह और भाजपा नेतृत्व के अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब उनके बेटे और बिहार सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
एनडीए बैठक में मोदी-शाह से हुई मुलाकात
मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित एनडीए की बैठक में देशभर के सहयोगी दलों के वरिष्ठ नेता शामिल हुए। इस कार्यक्रम में उपेंद्र कुशवाहा भी मौजूद रहे।
बैठक के दौरान उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की तस्वीरें भी सामने आईं। कार्यक्रम में वह अन्य नेताओं के साथ अनौपचारिक बातचीत करते और झालमुड़ी खाते हुए भी नजर आए।
हालांकि, इस मुलाकात को लेकर आधिकारिक तौर पर कोई विशेष जानकारी सामने नहीं आई है। लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे दीपक प्रकाश के राजनीतिक भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है।
एमएलसी टिकट नहीं मिलने से बढ़ी मुश्किल
बिहार विधान परिषद के द्विवार्षिक चुनाव में एनडीए ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की थी। इस सूची में दीपक प्रकाश का नाम शामिल नहीं था।
उपेंद्र कुशवाहा को उम्मीद थी कि उनके बेटे को विधान परिषद भेजा जाएगा। राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा था कि सहयोगी दल के हिस्से के रूप में उन्हें यह अवसर मिल सकता है।
लेकिन जब एनडीए के सभी उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल कर दिया और दीपक प्रकाश का नाम सूची में नहीं आया, तब उनके मंत्री पद को लेकर सवाल खड़े होने लगे।
बिना सदन के सदस्य बने दो बार मंत्री
दीपक प्रकाश का राजनीतिक सफर पिछले कुछ समय से चर्चा में रहा है। नवंबर 2025 में एनडीए सरकार बनने के बाद उन्हें मंत्री बनाया गया था, जबकि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे।
इसके बाद अप्रैल 2026 में बिहार में नेतृत्व परिवर्तन हुआ और नई सरकार का गठन हुआ। नई कैबिनेट में भी दीपक प्रकाश को फिर से मंत्री बनाया गया। उन्हें पंचायती राज विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई।
इस फैसले को लेकर विपक्ष के साथ-साथ राजनीतिक विश्लेषकों ने भी चर्चा की थी। कुछ नेताओं ने इसे परिवारवाद से जोड़कर सवाल उठाए थे, जबकि समर्थकों ने इसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व का हिस्सा बताया।
मंत्री पद बचाने के लिए क्या कहता है नियम?
भारतीय संविधान के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मंत्री बनता है और वह विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना होता है।
दीपक प्रकाश ने 8 मई को मंत्री पद की शपथ ली थी। ऐसे में निर्धारित समयसीमा के भीतर उन्हें किसी सदन की सदस्यता हासिल करनी होगी। यदि ऐसा नहीं होता है, तो उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है।
यही कारण है कि उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर लगातार चर्चा हो रही है।
बदलते राजनीतिक समीकरण भी चर्चा में
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बिहार में बदलते सामाजिक और राजनीतिक समीकरण भी इस पूरे घटनाक्रम को प्रभावित कर रहे हैं।
उपेंद्र कुशवाहा लंबे समय से कोइरी वोट बैंक की राजनीति का महत्वपूर्ण चेहरा माने जाते रहे हैं। लेकिन भाजपा के पास अब सम्राट चौधरी जैसे मजबूत क्षेत्रीय नेता भी मौजूद हैं, जिससे राजनीतिक समीकरणों में बदलाव देखने को मिल रहा है।
इसी वजह से सहयोगी दलों की भूमिका और उनकी राजनीतिक ताकत को लेकर भी नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
आगे क्या होगी रणनीति?
13 जून को राष्ट्रीय लोक मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने वाली है। इस बैठक में उपेंद्र कुशवाहा के दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने की संभावना जताई जा रही है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर इस बात पर भी है कि दीपक प्रकाश के मंत्री पद को बचाने के लिए पार्टी आगे कौन-सी रणनीति अपनाती है। दिल्ली में जारी राजनीतिक मुलाकातों और बैठकों को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
फिलहाल, मोदी और शाह से हुई मुलाकात ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह मुलाकात केवल संगठनात्मक थी या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश भी छिपा है।
