'मोहन भागवत को किस हैसियत से मिली Z+ सिक्योरिटी?' लालू-राबड़ी विवाद के बीच RJD का बड़ा सवाल

 


मोहन भागवत की Z+ सुरक्षा पर राजद के सवाल, लालू-राबड़ी मुद्दे से गरमाई सियासत

मोहन भागवत की Z+ सुरक्षा को लेकर बिहार की राजनीति में नया विवाद शुरू हो गया है। मोहन भागवत की Z+ सुरक्षा पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने सवाल उठाते हुए केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव को लेकर पहले से ही राजनीतिक बहस जारी है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बिहार दौरे के बीच यह मुद्दा अब सियासी चर्चा का केंद्र बन गया है।

रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत पटना पहुंचे। वे संघ के शताब्दी वर्ष कार्यक्रम के तहत 7 जून से 9 जून तक मुंगेर प्रवास पर हैं। उनके दौरे के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विपक्ष ने कई सवाल खड़े किए हैं।

आरएसएस प्रमुख के बिहार दौरे पर बढ़ी राजनीतिक चर्चा

मोहन भागवत का बिहार दौरा संघ के शताब्दी वर्ष कार्यक्रम के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके कार्यक्रमों को लेकर प्रशासन की ओर से व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई है।

पटना पहुंचने के बाद वे मुंगेर के लिए रवाना हुए, जहां विभिन्न संगठनात्मक कार्यक्रमों में भाग लेने का कार्यक्रम तय है। सुरक्षा एजेंसियां लगातार उनके दौरे की निगरानी कर रही हैं।

इसी दौरान राजद ने उनकी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए हैं, जिससे राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया है।

Z+ सुरक्षा को लेकर राजद ने क्या कहा?

राजद की राष्ट्रीय प्रवक्ता कंचन यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से मोहन भागवत को मिली Z+ श्रेणी की सुरक्षा पर सवाल उठाया।

उन्होंने पूछा कि मोहन भागवत किसी संवैधानिक पद पर नहीं हैं, न वे सांसद रहे हैं और न ही विधायक। ऐसे में उन्हें इतनी उच्च स्तरीय सुरक्षा क्यों प्रदान की जा रही है।

राजद ने यह भी सवाल किया कि एडवांस्ड सिक्योरिटी लाइजन (ASL) जैसी व्यवस्था किस आधार पर उपलब्ध कराई गई है। पार्टी का कहना है कि इस विषय पर स्पष्टता होनी चाहिए।

लालू-राबड़ी की सुरक्षा कटौती से जुड़ा विवाद

राजद ने इस मुद्दे को लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सुरक्षा व्यवस्था में हुए बदलाव से भी जोड़ा है।

पार्टी नेताओं का कहना है कि दोनों पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं। इसके बावजूद उनकी सुरक्षा में कटौती की गई, जबकि अन्य व्यक्तियों को उच्च स्तर की सुरक्षा उपलब्ध है।

हालांकि सुरक्षा व्यवस्था का निर्धारण आमतौर पर सुरक्षा एजेंसियों द्वारा खतरे के आकलन और निर्धारित मानकों के आधार पर किया जाता है। इस संबंध में सरकार की ओर से पहले भी समीक्षा प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है।

सुरक्षा समीक्षा के बाद क्या बदला?

हाल के दिनों में बिहार सरकार ने कई प्रमुख राजनीतिक व्यक्तियों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की थी। समीक्षा के बाद कुछ नेताओं की सुरक्षा में बदलाव किए गए।

जानकारी के अनुसार, तेजस्वी यादव की सुरक्षा व्यवस्था को यथावत रखा गया था। वहीं लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सुरक्षा श्रेणी में बदलाव किया गया।

तेज प्रताप यादव को सीमित सुरक्षा उपलब्ध कराई गई, जबकि सांसद मीसा भारती के लिए भी अलग सुरक्षा व्यवस्था निर्धारित की गई।

इन फैसलों के बाद लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी ने अपनी सुरक्षा वापस करने का निर्णय लिया था, जिसके बाद यह मामला राजनीतिक बहस का विषय बन गया।

बिहार की राजनीति में क्यों अहम है यह मुद्दा?

बिहार में सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े फैसले अक्सर राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन जाते हैं। जब मामला बड़े राजनीतिक चेहरों और राष्ट्रीय स्तर के संगठनों से जुड़ा हो, तब बहस और तेज हो जाती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुरक्षा का विषय केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक संदेशों से भी जुड़ जाता है। यही कारण है कि विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों इस मुद्दे पर अपनी-अपनी राय रख रहे हैं।

आने वाले विधानसभा चुनावों और बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों के बीच ऐसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं।

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल मोहन भागवत का बिहार दौरा जारी है और उनके कार्यक्रमों पर सुरक्षा एजेंसियां नजर बनाए हुए हैं। दूसरी ओर राजद लगातार सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठा रहा है।

संभव है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच बयानबाजी और तेज हो। हालांकि सुरक्षा संबंधी अंतिम निर्णय सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट और सरकारी प्रक्रियाओं के आधार पर ही लिए जाते हैं।

फिलहाल बिहार की राजनीति में सुरक्षा व्यवस्था का यह मुद्दा चर्चा के केंद्र में बना हुआ है और दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें सामने रख रहे हैं।

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