दीपक प्रकाश का मंत्री बने रहना मुश्किल! NDA में नहीं मिली सीट, रालोमो की राह में क्या बना रोड़ा


 

बिहार की राजनीति में दीपक प्रकाश मंत्री पद को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। विधान परिषद चुनाव के लिए एनडीए द्वारा उम्मीदवारों की घोषणा के बाद दीपक प्रकाश मंत्री पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के नेता और बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को एनडीए की घोषित सूची में जगह नहीं मिली है। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या उन्हें आने वाले महीनों में मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है।

मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य बने सीमित अवधि तक ही मंत्री रह सकता है। ऐसे में दीपक प्रकाश के राजनीतिक भविष्य पर सबकी निगाहें टिक गई हैं।

MLC चुनाव में क्यों नहीं मिला मौका?

बिहार विधानसभा कोटे से विधान परिषद की 10 सीटों पर चुनाव हो रहा है। इनमें नौ सीटों पर द्विवार्षिक चुनाव और एक सीट पर उपचुनाव होना है।

एनडीए ने अपने सभी नौ उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। भारतीय जनता पार्टी, जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के उम्मीदवारों को टिकट मिला, लेकिन दीपक प्रकाश का नाम सूची में शामिल नहीं हुआ।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन के भीतर सीटों का बंटवारा संख्या बल और राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर किया गया है। इसी वजह से रालोमो को इस बार मौका नहीं मिल पाया।

क्या कहता है संवैधानिक नियम?

भारतीय संविधान के अनुसार कोई व्यक्ति विधायक या विधान परिषद सदस्य बने बिना मंत्री तो बन सकता है, लेकिन उसे छह महीने के भीतर किसी न किसी सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होता है।

दीपक प्रकाश 7 मई 2026 को मंत्री बने थे। ऐसे में उन्हें 7 नवंबर 2026 तक विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना होगा।

यदि वह निर्धारित अवधि तक किसी सदन के सदस्य नहीं बन पाते हैं तो उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है। यही वजह है कि उनका राजनीतिक भविष्य चर्चा का विषय बना हुआ है।

क्या निकट भविष्य में कोई रास्ता बचा है?

फिलहाल राजनीतिक परिस्थितियां दीपक प्रकाश के लिए आसान नहीं दिख रही हैं।

विधान परिषद की जिन सीटों पर राज्यपाल मनोनयन करते हैं, उनका कार्यकाल अगले वर्ष समाप्त होगा। इससे पहले वहां कोई रिक्ति नहीं है। वहीं, विधानसभा की संभावित रिक्त सीटों पर भी रालोमो के लिए अवसर सीमित नजर आ रहे हैं।

राजधानी पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट को लेकर चर्चा जरूर है, लेकिन यह परंपरागत रूप से भाजपा का मजबूत क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में वहां से रालोमो के लिए दावेदारी आसान नहीं मानी जा रही।

उपेंद्र कुशवाहा ने क्या कहा?

रालोमो प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने अभी उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं मानी है।

मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि नामांकन प्रक्रिया पूरी होने तक इंतजार करना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं के साथ लगातार बातचीत जारी है और अंतिम स्थिति जल्द स्पष्ट हो सकती है।

हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उम्मीदवारों की घोषणा के बाद संभावना काफी सीमित हो गई है।

संख्या बल क्यों बना सबसे बड़ी चुनौती?

विधान परिषद चुनाव का गणित रालोमो के पक्ष में नहीं दिख रहा है।

विधानसभा में एनडीए के पास लगभग 201 विधायक हैं। इस संख्या के आधार पर गठबंधन के नौ उम्मीदवारों की जीत लगभग तय मानी जा रही है।

रालोमो के पास केवल चार विधायक हैं, जबकि हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के पास पांच और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के पास 19 विधायक हैं। ऐसे में सीटों के वितरण में छोटे दलों के लिए विकल्प सीमित हो गए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन ने जीत सुनिश्चित करने की रणनीति के तहत उम्मीदवारों का चयन किया है।

महागठबंधन में भी उम्मीदवार को लेकर मंथन

दूसरी ओर महागठबंधन की ओर से भी उम्मीदवार चयन को लेकर मंथन जारी है।

राष्ट्रीय जनता दल की तरफ से अंतिम नाम की घोषणा का इंतजार किया जा रहा है। कई नाम चर्चा में हैं और पार्टी नेतृत्व अंतिम निर्णय लेने में जुटा है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि विधान परिषद चुनाव भले ही संख्या बल का खेल हो, लेकिन इसके राजनीतिक संदेश दूरगामी हो सकते हैं।

आगे क्या हो सकता है?

दीपक प्रकाश के सामने सबसे बड़ी चुनौती अगले कुछ महीनों में किसी सदन की सदस्यता हासिल करने की है।

यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो संवैधानिक प्रावधानों के तहत उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है। हालांकि राजनीति में अंतिम निर्णय अक्सर आखिरी समय में बदलते भी रहे हैं।

ऐसे में आने वाले सप्ताह बिहार की राजनीति के लिए काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। सभी की नजरें अब एनडीए की अगली रणनीति और रालोमो के संभावित विकल्पों पर टिकी हुई हैं।

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