पटना। बिहार मानसून 2026 को लेकर मौसम वैज्ञानिकों ने अहम संकेत दिए हैं। अनुमान है कि बिहार मानसून 2026 के दौरान राज्य में सामान्य से करीब 20 प्रतिशत कम वर्षा हो सकती है। मौसम विभाग के अनुसार अल नीनो की सक्रियता दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर कर सकती है, जिससे कई जिलों में सूखे जैसी स्थिति, पेयजल संकट और कृषि क्षेत्र पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बंगाल की खाड़ी में परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो मानसून 12 जून के आसपास बिहार में प्रवेश कर सकता है। हालांकि, इसकी सक्रियता सामान्य वर्षों की तुलना में कमजोर रहने की संभावना जताई जा रही है।
12 जून के आसपास बिहार पहुंच सकता है मानसून
मौसम विज्ञान केंद्र पटना के अनुसार आमतौर पर बिहार में मानसून 15 जून के आसपास दस्तक देता है। इस बार बंगाल की खाड़ी में अनुकूल परिस्थितियां बनने पर मानसून कुछ दिन पहले भी पहुंच सकता है।
हालांकि मानसून के आगमन से अधिक चिंता उसकी तीव्रता को लेकर है। विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो के प्रभाव के कारण मानसूनी हवाओं की ताकत कमजोर पड़ सकती है, जिससे वर्षा का वितरण प्रभावित होगा।
अल नीनो कैसे घटाता है बारिश?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु पैटर्न है, जिसकी शुरुआत प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में होती है। इस दौरान समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है।
तापमान बढ़ने से वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है। इसका असर भारत के मानसून पर भी पड़ता है। अल नीनो की स्थिति में हिंद महासागर और अरब सागर से आने वाली ठंडी एवं नमी वाली हवाएं कमजोर हो जाती हैं, जिससे बारिश कम होने लगती है।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो जितना मजबूत होता है, मानसून पर उसका प्रभाव उतना ही अधिक दिखाई देता है।
जून-जुलाई में कम बारिश के संकेत
मौसम विभाग के आकलन के अनुसार जून और जुलाई में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है। खासकर बिहार के मध्य और पश्चिमी हिस्सों में बारिश की कमी अधिक देखने को मिल सकती है।
उत्तर-पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी बिहार के कुछ क्षेत्रों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रह सकती है, लेकिन राज्य के बड़े हिस्से में वर्षा की कमी चिंता का कारण बन सकती है।
कम बारिश का सीधा असर भूजल स्तर, पेयजल उपलब्धता और सिंचाई व्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि वर्षा में उल्लेखनीय कमी रहती है तो कई जिलों में सूखे जैसी स्थिति भी बन सकती है।
पिछले 10 वर्षों का रिकॉर्ड क्या कहता है?
मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 10 वर्षों में केवल तीन बार ही बिहार में सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई है।
वर्ष 2020 में सबसे अधिक 1272.5 मिमी बारिश हुई थी, जबकि सामान्य वर्षा का मानक 992.2 मिमी है। वर्ष 2019 में 1050 मिमी और 2021 में 1044.5 मिमी वर्षा रिकॉर्ड की गई थी।
इसके विपरीत हाल के वर्षों में बारिश का स्तर लगातार सामान्य से नीचे रहा है। वर्ष 2025 में केवल 686.3 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य औसत से काफी कम थी।
यह आंकड़े संकेत देते हैं कि राज्य में वर्षा का पैटर्न लगातार बदल रहा है और जलवायु परिवर्तन भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
तापमान 45 डिग्री के पार जाने का खतरा
अल नीनो का प्रभाव केवल बारिश तक सीमित नहीं रहता। इसके कारण तापमान में भी उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जून महीने में बिहार के कई जिलों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास या उससे अधिक पहुंच सकता है। इसके चलते कई इलाकों में लू जैसी परिस्थितियां बनने की आशंका है।
गर्मी बढ़ने से बिजली की मांग, जल उपयोग और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं।
खेती पर पड़ सकता है बड़ा असर
यदि बारिश सामान्य से कम रहती है तो इसका सबसे बड़ा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर दिखाई देगा। बिहार की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और खरीफ फसलों की बुवाई मानसूनी बारिश पर आधारित होती है।
धान, मक्का और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होने से उत्पादन में कमी आ सकती है। इससे किसानों की लागत बढ़ने और कृषि आय पर असर पड़ने की संभावना है।
हालांकि मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि जुलाई के बाद मानसून की स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है। अगस्त और सितंबर में सामान्य या उससे अधिक वर्षा होने की संभावना भी जताई जा रही है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले सप्ताह बिहार के मौसम के लिए महत्वपूर्ण होंगे। यदि बंगाल की खाड़ी में अनुकूल प्रणाली विकसित होती है तो मानसून समय पर पहुंच सकता है, लेकिन अल नीनो की सक्रियता वर्षा की मात्रा को प्रभावित कर सकती है।
ऐसे में जल संरक्षण, सिंचाई प्रबंधन और कृषि तैयारी पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा, ताकि संभावित जल संकट और फसल नुकसान के प्रभाव को कम किया जा सके।
