नौकरी के बदले जमीन केस: लालू यादव के कथित ‘सीक्रेट मॉडल’ का खुलासा, जानिए किसके हाथ में थी पूरी कमान

पटना:
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के लिए ‘नौकरी के बदले जमीन’ मामला अब तक की सबसे बड़ी कानूनी चुनौतियों में से एक बन गया है। इस केस में न सिर्फ लालू यादव, बल्कि उनके परिवार के कई सदस्य भी जांच के दायरे में हैं। सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या यह पूरा मामला किसी एक गलती का नतीजा था या फिर एक सोची-समझी रणनीति के तहत तैयार किया गया कथित ‘मॉडल’?
सीबीआई की जांच और कोर्ट में पेश आरोपों के अनुसार, यह मामला किसी आकस्मिक लेन-देन का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नेटवर्क और ऑपरेशनल सिस्टम के तहत अंजाम दिया गया।
कैसे काम करता था ‘नौकरी के बदले जमीन’ मॉडल?
सीबीआई का दावा है कि लालू यादव के रेल मंत्री रहते हुए रेलवे में ग्रुप-डी पदों पर नियुक्तियों के बदले पटना और उसके आसपास की कीमती जमीनें हासिल की गईं। आरोप है कि इन भर्तियों में न तो किसी तरह का सार्वजनिक विज्ञापन निकाला गया और न ही तय प्रक्रिया का पालन किया गया।
जांच एजेंसी के अनुसार, यह पूरा सिस्टम रेलवे के अलग-अलग जोन तक फैला हुआ था, जिसे एक इंटरनल नेटवर्क के जरिए नियंत्रित किया जा रहा था।
भोला यादव की अहम भूमिका
इस पूरे मामले में लालू यादव के तत्कालीन ओएसडी (OSD) भोला यादव को कथित तौर पर ऑपरेशनल हेड माना गया है। सीबीआई के अनुसार, भोला यादव पटना स्थित कैंप ऑफिस से पूरे ‘प्रोजेक्ट’ को संचालित कर रहे थे।
आरोप है कि:
- उम्मीदवारों की लिस्ट तैयार करने की जिम्मेदारी भोला यादव के पास थी
- जमीन मालिकों और नौकरी के इच्छुक अभ्यर्थियों से संपर्क वही करते थे
- रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों से तालमेल बनाकर फाइलें आगे बढ़वाई जाती थीं
जांच में यह भी सामने आया है कि भोला यादव उम्मीदवारों, जमीन और रेलवे अफसरों के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में काम कर रहे थे।
हार्ड डिस्क से सामने आया मास्टर प्लान
लालू यादव के आवास से बरामद एक हार्ड डिस्क इस केस का सबसे मजबूत डिजिटल सबूत मानी जा रही है। इसमें:
- उम्मीदवारों के नाम
- संबंधित रेलवे जोन
- नियुक्ति की स्थिति
जैसी विस्तृत जानकारियां दर्ज थीं। सीबीआई का कहना है कि इससे साफ होता है कि यह कोई बिखरा हुआ मामला नहीं था, बल्कि इसे एक संगठित ऑपरेशन की तरह चलाया जा रहा था।
‘एमआर सेल’ से होती थी भर्ती की सेटिंग
सीबीआई के मुताबिक, तत्कालीन रेल मंत्री के ऑफिस यानी एमआर सेल (Minister of Railways Cell) ने इस कथित घोटाले में अहम भूमिका निभाई। आरोप है कि:
- आधिकारिक भर्ती प्रक्रिया को दरकिनार किया गया
- बिना विज्ञापन और वैरिफिकेशन के नियुक्तियां हुईं
- रेलवे जोन के महाप्रबंधकों पर दबाव बनाया गया
एमआर सेल को रेलवे में एक बेहद प्रभावशाली इकाई माना जाता है, और इसी ताकत का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल किया गया।
कोर्ट की नजर में ‘मुख्य भूमिका’ किसकी?
हालांकि सीबीआई ने भोला यादव को योजना को जमीन पर लागू करने वाला व्यक्ति बताया है, लेकिन कोर्ट के मुताबिक इस पूरे मामले में निर्णायक और बड़ी भूमिका लालू प्रसाद यादव की थी।
कोर्ट की टिप्पणी के अनुसार, रेल मंत्री की अनुमति और राजनीतिक प्रभाव के बिना देश के अलग-अलग रेलवे जोन में इस तरह की नियुक्तियां संभव नहीं थीं।
जमीन सीधे नहीं, कंपनियों के जरिए ली गई
जांच में यह भी आरोप सामने आया है कि कुछ जमीनें सीधे परिवार के नाम न लेकर पहले कंपनियों के नाम की गईं। बाद में इन कंपनियों का स्वामित्व कथित तौर पर लालू यादव के परिवार के सदस्यों को सौंप दिया गया।
इस प्रक्रिया में कुछ राजनीतिक सहयोगियों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई जा रही है।
आगे क्या?
‘नौकरी के बदले जमीन’ केस ने बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया है। आने वाले दिनों में अदालत की कार्यवाही और जांच एजेंसियों की रिपोर्ट इस मामले में कई नए खुलासे कर सकती है।