पटना: 2025 के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले रोहिणी आचार्य ने नेतृत्व पर सवाल खड़े किए, अब पार्टी के वरिष्ठ नेता भाई वीरेन्द्र ने बिना नाम लिए तेजस्वी यादव पर परोक्ष हमला कर दिया है। सवाल उठता है—आखिर RJD की यह दुर्दशा क्यों हुई? क्या इसकी जड़ें 2016–17 की उसी सियासी गलती में छिपी हैं, जिसने महागठबंधन को तोड़ दिया?
2015: जब नीतीश ने लालू को दिया नया सियासी जीवन
2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव को राजनीतिक रूप से संजीवनी दी। 22 विधायकों तक सिमटी RJD महागठबंधन के सहारे 80 सीटों तक पहुंच गई। लालू यादव एक बार फिर सत्ता के केंद्र में आ गए।
अगर यह गठबंधन चलता रहता, तो आज RJD की स्थिति शायद इतनी कमजोर नहीं होती। लेकिन सवाल यह है कि 2017 में नीतीश कुमार ने रिश्ता तोड़ा क्यों?
शहाबुद्दीन का वो बयान, जो भारी पड़ गया
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि महागठबंधन टूटने की सबसे बड़ी वजह बने मो. शहाबुद्दीन।
10 सितंबर 2016 को 11 साल बाद जेल से बाहर आते ही शहाबुद्दीन ने नीतीश कुमार पर तीखा हमला बोला—
- “नीतीश कुमार परिस्थितियों के मुख्यमंत्री हैं”
- “वे मास लीडर नहीं हैं”
- “अकेले लड़कर 20 सीट भी नहीं ला सकते”
- “वे मधु कोड़ा जैसे गठबंधन के मुख्यमंत्री हैं”
यहीं नहीं रुके, उन्होंने साफ कहा कि “मेरे नेता सिर्फ लालू यादव हैं।”
जब लालू ने शहाबुद्दीन का बचाव किया
हालात तब और बिगड़ गए जब इन बयानों पर लालू प्रसाद यादव ने शहाबुद्दीन का खुला बचाव किया। यह बात नीतीश कुमार को अंदर तक चुभ गई। सार्वजनिक रूप से उन्होंने जरूर कहा कि “ऐसी बातों को महत्व नहीं देता”, लेकिन राजनीतिक रूप से उन्होंने मन ही मन फैसला कर लिया था कि आगे क्या करना है।
नीतीश ने सही मौके का किया इंतजार
नीतीश कुमार जल्दबाजी करने वालों में नहीं हैं। वे मौके का इंतजार करते रहे।
जुलाई 2017 में जब उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, तो नीतीश को वह मौका मिल गया जिसकी उन्हें तलाश थी।
26 जुलाई 2017 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और महागठबंधन टूट गया। यहीं से RJD के पतन की असली शुरुआत हुई।
शहाबुद्दीन की खुन्नस की असली वजह क्या थी?
सवाल उठता है कि आखिर शहाबुद्दीन को नीतीश कुमार से इतनी नाराजगी क्यों थी?
दरअसल, नवंबर 2005 में गिरफ्तारी के बाद शहाबुद्दीन को अंदाजा नहीं था कि उन्हें 11 साल जेल में रहना पड़ेगा। हर जमानत याचिका का नीतीश सरकार ने कड़ा विरोध किया।
- 2006 में सिवान जेल के अंदर स्पेशल कोर्ट बना
- 7 मामलों में सजा
- 2 मामलों में उम्रकैद
- 2 मामलों में 10-10 साल की सजा
सजायाफ्ता होने के कारण शहाबुद्दीन का राजनीतिक करियर पूरी तरह खत्म हो गया।
सीवान में भी खत्म हो गया ‘साहेब’ का असर
जिस सीवान में कभी शहाबुद्दीन का दबदबा था, वहीं उनकी पत्नी हिना शहाब 2009 और 2014 का लोकसभा चुनाव हार गईं।
नाम, रुतबा और सियासी ताकत—सब कुछ खत्म हो चुका था। माना जाता है कि नीतीश कुमार के सख्त कानून-व्यवस्था वाले शासन में ही यह संभव हो पाया।
भड़ास का नतीजा: RJD को चुकानी पड़ी कीमत
2016 में जेल से निकलते ही शहाबुद्दीन ने अपनी पूरी भड़ास नीतीश कुमार पर निकाल दी।
लेकिन इसकी कीमत उन्हें नहीं, बल्कि लालू यादव और RJD को चुकानी पड़ी।
महागठबंधन टूटा, सत्ता गई और आज हाल यह है कि पार्टी के अंदर ही नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं।
निष्कर्ष
अगर मो. शहाबुद्दीन ने नीतीश कुमार के खिलाफ वह अपमानजनक बयान नहीं दिया होता,
अगर लालू यादव ने उस बयान का बचाव नहीं किया होता,
तो शायद आज RJD इस हालत में नहीं होती।
राजनीति में एक बयान भी इतिहास बदल सकता है, और बिहार की राजनीति में यह उसका सबसे बड़ा उदाहरण बन गया।
