कौन हैं डॉ. मनीष कुमार?, EOU ने BPSC पेपर लीक मामले में डॉ. मनीष को दबोचा

 


BPSC TRE-3 पेपर लीक मामले में आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए डॉ. मनीष कुमार को गिरफ्तार कर लिया है। BPSC TRE-3 पेपर लीक की जांच में एजेंसी का दावा है कि डॉ. मनीष कथित पेपर लीक नेटवर्क से जुड़े प्रमुख लोगों में शामिल था और कई अहम कड़ियों को जोड़ने का काम करता था। गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसी अब बैंक खातों, पैसों के लेनदेन और कथित अवैध संपत्तियों की भी जांच कर रही है।

EOU के अनुसार, यह मामला केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें संगठित नेटवर्क, करोड़ों रुपये की कथित डील और तकनीकी तरीके से प्रश्नपत्र हासिल करने जैसी गंभीर बातें सामने आई हैं। अब तक इस केस में सैकड़ों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, जबकि कई मुख्य आरोपी अभी भी फरार बताए जा रहे हैं।

कौन हैं डॉ. मनीष कुमार?

जांच एजेंसी के मुताबिक, डॉ. मनीष कुमार जहानाबाद जिले के नेहालपुर के रहने वाले हैं। वह NMCH के 2021 बैच के छात्र रह चुके हैं। कुछ समय तक कैमूर में सरकारी डॉक्टर के रूप में कार्य करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पटना में NEET PG की तैयारी करने लगे।

जांच के दौरान उनका नाम तब सामने आया जब EOU ने मेडिकल कॉलेजों से जुड़े छात्रों और संदिग्ध संपर्कों का विश्लेषण किया। एजेंसी का कहना है कि तकनीकी जांच में उनके मोबाइल नंबर की लोकेशन कई अहम स्थानों से जुड़ी मिली, जिससे जांच आगे बढ़ी।

डॉ. शिव और डॉ. शुभम से जुड़े होने का दावा

EOU का दावा है कि डॉ. मनीष, इस मामले के कथित मास्टरमाइंड संजीव मुखिया के बेटे डॉ. शिव और डॉ. शुभम के करीबी रहे हैं। जांच एजेंसी के अनुसार, यह तिकड़ी पहले भी पेपर लीक से जुड़े मामलों में चर्चा में रही है।

जांच के दौरान पुलिस को हजारीबाग के कोहिनूर होटल से मिले CCTV फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्यों में भी डॉ. मनीष की मौजूदगी के संकेत मिले। एजेंसी का कहना है कि शुरुआती पूछताछ में उन्होंने जांच को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन सबूत सामने आने के बाद कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलीं।

30 अभ्यर्थियों से 1.20 करोड़ रुपये की कथित डील

EOU की जांच में सामने आया है कि 15 मार्च 2024 की परीक्षा से पहले 30 अभ्यर्थियों को पटना से हजारीबाग ले जाया गया था। जांच एजेंसी का आरोप है कि इन अभ्यर्थियों से कुल 1.20 करोड़ रुपये लिए गए।

जांच के अनुसार, इस पूरी व्यवस्था में डॉ. मनीष की भूमिका अहम थी। एजेंसी का दावा है कि प्रति अभ्यर्थी 50 हजार रुपये कमीशन तय था, जिसके आधार पर उन्हें लगभग 15 लाख रुपये मिलने थे।

हालांकि, इन आरोपों की न्यायिक प्रक्रिया अभी जारी है और अंतिम निर्णय अदालत के आदेश के बाद ही स्पष्ट होगा।

सीलबंद बक्से खोलने की कथित तकनीक ने बढ़ाई जांच

जांच एजेंसी का दावा है कि नेटवर्क प्रश्नपत्र वाले सीलबंद बक्सों तक पहुंचने के लिए विशेष तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल करता था। आरोप है कि बक्से को नीचे की ओर से इस तरह खोला जाता था कि ऊपर लगी आधिकारिक सील को कोई नुकसान नहीं पहुंचता था।

इसके बाद प्रश्नपत्रों की तस्वीरें लेकर उन्हें दोबारा उसी स्थिति में बंद कर दिया जाता था। एजेंसी के अनुसार, इसी वजह से पहली नजर में किसी प्रकार की छेड़छाड़ का पता नहीं चलता था। इन दावों की पुष्टि के लिए जांच एजेंसी तकनीकी और फॉरेंसिक साक्ष्य भी जुटा रही है।

अब तक 296 गिरफ्तारियां, 15 आरोपी अब भी फरार

EOU के मुताबिक, BPSC TRE-3 पेपर लीक मामले में अब तक 296 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। वहीं, 15 मुख्य आरोपी अभी भी फरार बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश लगातार जारी है।

जांच एजेंसी का कहना है कि फरार आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कई राज्यों में कार्रवाई चल रही है। साथ ही बैंक खातों, डिजिटल ट्रांजैक्शन और कथित अपराध से अर्जित संपत्ति की पहचान कर उसे जब्त करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।

आगे जांच में क्या होगा?

डॉ. मनीष कुमार की गिरफ्तारी के बाद EOU अब उनके वित्तीय रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विस्तृत जांच कर रही है। एजेंसी यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरफ्तारी से जांच को नई दिशा मिल सकती है और आने वाले दिनों में इस मामले में कुछ और बड़े खुलासे संभव हैं। हालांकि, सभी आरोपों पर अंतिम फैसला न्यायालय की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।

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