दीपक प्रकाश पर फिलहाल नहीं मंडरा रहा संकट, सम्राट बोले- मंत्री हैं और रहेंगे


 

बिहार की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से दीपक प्रकाश के मंत्री पद को लेकर चर्चाएं तेज थीं। विधान परिषद चुनाव में मौका नहीं मिलने के बाद माना जा रहा था कि दीपक प्रकाश के सामने मंत्री पद बचाने की चुनौती खड़ी हो सकती है। हालांकि अब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बयान ने इन अटकलों पर फिलहाल विराम लगा दिया है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि दीपक प्रकाश आज भी मंत्री हैं और आगे भी बने रहेंगे।

पंचायती राज मंत्री के रूप में कार्य कर रहे दीपक प्रकाश फिलहाल विधानसभा या विधान परिषद, किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। इसी वजह से उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे थे।

सम्राट चौधरी ने क्या कहा?

पटना में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि संविधान और नियमों के तहत कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य बने सीमित अवधि तक मंत्री रह सकता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि वह स्वयं भी करीब पांच महीने 28 दिनों तक बिना किसी सदन के सदस्य बने मंत्री रह चुके हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि दीपक प्रकाश के मामले में भी नियमों के तहत कोई तत्काल संकट नहीं है और वह मंत्री पद पर बने हुए हैं।

हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि आने वाले महीनों में दीपक प्रकाश को किस रास्ते से सदन की सदस्यता दिलाई जाएगी।

मंत्री पद पर संकट की चर्चा क्यों शुरू हुई?

दरअसल, हाल ही में हुए बिहार विधान परिषद चुनाव में दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया गया। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई कि यदि वह किसी सदन के सदस्य नहीं बने तो उनका मंत्री पद खतरे में पड़ सकता है।

दीपक प्रकाश ने 7 मई 2026 को मंत्री पद की शपथ ली थी। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार कोई भी व्यक्ति मंत्री बनने के बाद छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बन सकता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।

यानी नवंबर 2026 के शुरुआती दिनों तक उनके पास सदन की सदस्यता हासिल करने का समय है।

क्या भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा के पाले में गेंद डाल दी?

मुख्यमंत्री के बयान के बाद राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग मायने निकाल रहे हैं। माना जा रहा है कि भाजपा ने अब यह जिम्मेदारी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा पर छोड़ दी है कि वह अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य को लेकर क्या रणनीति अपनाते हैं।

एनडीए के भीतर सीट बंटवारे और राजनीतिक समझौतों को लेकर पहले भी कई चर्चाएं होती रही हैं। ऐसे में दीपक प्रकाश के भविष्य को लेकर भी कई संभावनाएं सामने आ रही हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री के बयान ने यह संकेत जरूर दिया है कि फिलहाल सरकार दीपक प्रकाश को हटाने के मूड में नहीं है।

एमएलसी नहीं बनाए जाने के पीछे क्या वजह बताई जा रही?

राजनीतिक हलकों में यह माना जा रहा था कि विधान परिषद चुनाव के दौरान दीपक प्रकाश को एमएलसी बनाया जा सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

भाजपा नेताओं का तर्क है कि इसी दौरान राज्यसभा चुनाव भी हुए थे और पार्टी के समर्थन से उपेंद्र कुशवाहा दोबारा राज्यसभा पहुंचे। इसके बाद राजनीतिक समीकरण बदल गए।

इसी बीच यह चर्चा भी रही कि दीपक प्रकाश को एमएलसी बनाने के बदले रालोमो के भाजपा में विलय का प्रस्ताव रखा गया था। हालांकि इस तरह की चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई और उपेंद्र कुशवाहा ने भी पार्टी के विलय की संभावना से इनकार किया था।

उपेंद्र कुशवाहा के सामने क्या विकल्प हैं?

रालोमो के पास बिहार विधानसभा में चार विधायक हैं। इनमें उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता भी शामिल हैं।

यदि भविष्य में किसी कारणवश दीपक प्रकाश को मंत्री पद छोड़ना पड़ता है तो पार्टी अपने किसी विधायक को मंत्रिमंडल में भेज सकती है। स्नेहलता या विधायक दल के नेता माधव आनंद ऐसे संभावित नाम हो सकते हैं।

दूसरा विकल्प यह है कि दीपक प्रकाश को किसी उपचुनाव के जरिए विधानसभा भेजा जाए। राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि यदि स्नेहलता अपनी सीट छोड़ती हैं तो दीपक प्रकाश चुनाव लड़ सकते हैं। हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है।

इसके अलावा, इस वर्ष के अंत में विधान परिषद की कुछ सीटें खाली होने की संभावना है। ऐसे में दीपक प्रकाश शिक्षक या स्नातक क्षेत्र की किसी सीट से भी चुनाव लड़ सकते हैं।

आगे क्या होगा?

फिलहाल मुख्यमंत्री के बयान ने यह साफ कर दिया है कि दीपक प्रकाश को लेकर तत्काल कोई संवैधानिक संकट नहीं है। लेकिन नवंबर 2026 से पहले उन्हें विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना होगा।

अब सबकी नजर उपेंद्र कुशवाहा और एनडीए की आगामी राजनीतिक रणनीति पर टिकी है। आने वाले महीनों में लिया गया फैसला ही तय करेगा कि दीपक प्रकाश मंत्री पद पर बने रहते हैं या उन्हें नई राजनीतिक राह चुननी पड़ती है।

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