Bihar MLC Election को लेकर बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। Bihar MLC Election के लिए सत्तारूढ़ एनडीए ने अपने उम्मीदवारों की तस्वीर लगभग साफ कर दी है, जबकि विपक्षी महागठबंधन अब भी उम्मीदवार चयन को लेकर मंथन में जुटा है। विधान परिषद की नौ सीटों के चुनाव में सबसे अधिक चर्चा राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की संभावित रणनीति को लेकर हो रही है।
राजनीतिक गलियारों में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि विपक्षी खेमे से आखिर किस चेहरे को मौका मिलेगा। संख्या बल के हिसाब से विपक्ष के लिए केवल एक सीट जीतना आसान माना जा रहा है, लेकिन उम्मीदवार चयन की चुनौती बड़ी बन गई है।
विधान परिषद चुनाव का गणित क्या कहता है?
बिहार विधान परिषद की नौ सीटों के लिए होने वाले चुनाव में जीत का गणित काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक उम्मीदवार को जीत सुनिश्चित करने के लिए लगभग 28 विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ती है।
आरजेडी के पास अपने दम पर आवश्यक संख्या नहीं है। ऐसे में उसे कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर रहना होगा। यही वजह है कि उम्मीदवार के चयन में राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखा जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी एकता इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
RJD में एक सीट के लिए कई नाम चर्चा में
आरजेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती उम्मीदवार चयन को लेकर दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर कई नेताओं के नाम संभावित उम्मीदवारों की सूची में बताए जा रहे हैं।
हाल के दिनों में पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की सिंगापुर यात्रा के बाद उनकी बेटी रोहिणी आचार्या का नाम भी राजनीतिक चर्चाओं में शामिल हुआ है। हालांकि पार्टी की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
इसके अलावा पूर्व एमएलसी सुनील सिंह का नाम भी चर्चा में है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी नेतृत्व को ऐसा उम्मीदवार चुनना होगा जो संगठन और सहयोगी दलों दोनों के लिए स्वीकार्य हो।
यही कारण है कि तेजस्वी यादव के सामने यह फैसला आसान नहीं माना जा रहा है।
NDA की रणनीति के बाद बदला चुनावी माहौल
एनडीए की ओर से भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर चुनावी समीकरणों को लगभग स्पष्ट कर दिया है।
इसके साथ ही लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की ओर से भी उम्मीदवार के नाम का ऐलान किया जा चुका है। इससे चुनावी मुकाबले की तस्वीर काफी हद तक साफ हुई है।
हालांकि नौवीं सीट को लेकर अब भी राजनीतिक दिलचस्पी बनी हुई है। विपक्ष और अन्य दलों के रुख पर ही आगे की रणनीति निर्भर करेगी।
उपेंद्र कुशवाहा का फैसला क्यों महत्वपूर्ण?
इस चुनाव में सबकी नजर राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा पर भी टिकी हुई है। राजनीतिक चर्चाओं में यह संभावना जताई जा रही है कि यदि उनकी पार्टी अलग रणनीति अपनाती है तो मुकाबला और रोचक हो सकता है।
विशेष रूप से दूसरी वरीयता के वोटों का महत्व ऐसे चुनावों में काफी बढ़ जाता है। यही वजह है कि छोटे दल और निर्दलीय विधायक भी महत्वपूर्ण भूमिका में दिखाई दे रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि मुकाबला अपेक्षा से अधिक प्रतिस्पर्धी हुआ तो हर वोट की अहमियत बढ़ जाएगी।
कांग्रेस विधायकों की भूमिका पर भी नजर
हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान बिहार की राजनीति में क्रॉस वोटिंग को लेकर काफी चर्चा हुई थी। उस चुनाव में कुछ विधायकों के मतदान को लेकर विपक्षी खेमे में सवाल उठे थे।
अब विधान परिषद चुनाव में भी कांग्रेस के कुछ विधायकों की भूमिका पर राजनीतिक दलों की नजर बनी हुई है। विपक्षी एकजुटता बनाए रखना महागठबंधन के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
यदि सभी सहयोगी दल एकजुट रहते हैं तो विपक्ष की स्थिति मजबूत हो सकती है।
AIMIM की मांग ने बढ़ाया राजनीतिक दबाव
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM भी इस चुनाव में चर्चा का विषय बनी हुई है। राज्यसभा चुनाव के दौरान विपक्ष का समर्थन करने के बाद पार्टी की ओर से राजनीतिक हिस्सेदारी की मांग की चर्चा हो रही है।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, यदि सीट बंटवारे या उम्मीदवार चयन को लेकर सहयोगी दल पूरी तरह संतुष्ट नहीं होते हैं, तो चुनावी मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है।
हालांकि अंतिम तस्वीर उम्मीदवारों की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी।
क्या होगा आगे?
बिहार विधान परिषद चुनाव में अब सबसे बड़ा इंतजार आरजेडी के उम्मीदवार के नाम का है। एनडीए अपनी रणनीति स्पष्ट कर चुका है, जबकि विपक्षी खेमे में अब भी मंथन जारी है।
एक सीट के लिए कई दावेदारों की मौजूदगी ने राजनीतिक उत्सुकता बढ़ा दी है। आने वाले दिनों में उम्मीदवारों की घोषणा और सहयोगी दलों के रुख से चुनावी तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी।
फिलहाल बिहार की राजनीति में MLC चुनाव सबसे चर्चित विषयों में से एक बना हुआ है।
