भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद भी नहीं बदलेगा 'सम्राट मॉडल', अपराध पर सख्ती के संकेत

पटना: भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर बिहार की राजनीति में लगातार बहस जारी है। विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं ने भी इस मामले पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने साफ कर दिया है कि अपराध नियंत्रण की उनकी नीति में कोई बदलाव नहीं होगा। उनका कहना है कि बिहार में अपराधियों के लिए अब कोई जगह नहीं है और कानून का सख्ती से पालन कराया जाएगा। मुख्यमंत्री के हालिया बयान को कई लोग "सम्राट मॉडल" के तौर पर देख रहे हैं। इस मॉडल का केंद्र बिंदु अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई है। हालांकि, भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर पुलिस कार्रवाई पर उठे सवालों ने इस नीति को लेकर नई बहस भी शुरू कर दी है।
क्या बोले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी?
भरत तिवारी एनकाउंटर विवाद के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने स्पष्ट कहा कि बिहार को अपराधमुक्त बनाना उनकी प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि अपराधियों के सामने सरकार कभी नहीं झुकेगी। मुख्यमंत्री ने अपराधियों को चेतावनी देते हुए कहा कि उनके पास केवल दो विकल्प हैं—या तो जेल जाएं या बिहार छोड़ दें। उन्होंने यह भी कहा कि अपराध के खिलाफ अभियान किसी राजनीतिक दबाव से प्रभावित नहीं होगा।
एनकाउंटर पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद कई राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि गिरफ्तारी संभव थी तो मुठभेड़ की नौबत क्यों आई। राज्य सरकार ने मामले की न्यायिक जांच का फैसला लिया है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि सरकार पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा चाहती है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पुलिस की कार्रवाई तय प्रक्रिया के अनुरूप थी या नहीं।
बिहार में पहले भी सामने आए हैं ऐसे मामले
बिहार में कथित फर्जी एनकाउंटर को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। वर्ष 1993 में गया जिले के बाराचट्टी क्षेत्र में हुए चर्चित एनकाउंटर मामले में अदालतों ने संबंधित पुलिसकर्मियों को दोषी माना था। उस मामले में निचली अदालत ने मृत्युदंड सुनाया था, जिसे बाद में उच्च न्यायालय और अंततः सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया के दौरान आजीवन कारावास में बदल दिया गया। यह मामला आज भी पुलिस जवाबदेही की चर्चा में उदाहरण के रूप में सामने आता है।
क्या एनकाउंटर को जातीय रंग दिया गया?
भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद कुछ राजनीतिक दलों ने इसे जातीय नजरिए से भी जोड़ने की कोशिश की। आरोप लगाया गया कि एक विशेष वर्ग को निशाना बनाया जा रहा है। हालांकि, इससे पहले मोतिहारी में एसटीएफ की कार्रवाई में कुंदन ठाकुर और प्रियांशु दुबे की मौत के मामले में ऐसा व्यापक जातीय विवाद सामने नहीं आया था। उस घटना में दोनों पर पुलिस टीम पर हमला करने का आरोप था। यही कारण है कि दोनों घटनाओं की तुलना भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हुई है।
भरत तिवारी का मामला क्यों माना जा रहा अलग?
भरत तिवारी को लेकर कई स्थानीय लोगों का दावा है कि वह जनसुविधाओं और स्थानीय समस्याओं को लेकर सक्रिय रहता था। हालांकि, उसके खिलाफ कानूनी मामले भी दर्ज थे और पुलिस उसे वांछित मानती थी। इसी वजह से इस पूरे मामले में दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। एक पक्ष इसे कानून-व्यवस्था से जुड़ा मामला मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष पुलिस कार्रवाई की वैधता और प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है।
आगे क्या होगा?
अब सभी की नजर न्यायिक जांच पर टिकी है। जांच से यह स्पष्ट होगा कि पुलिस की कार्रवाई नियमों के अनुरूप थी या कहीं प्रक्रिया में चूक हुई। वहीं, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बयानों से यह संकेत साफ है कि अपराध के खिलाफ उनकी सख्त नीति फिलहाल जारी रहेगी। राजनीतिक विवाद अपनी जगह है, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने पुलिस कार्रवाई, जवाबदेही और कानून व्यवस्था पर नई बहस जरूर छेड़ दी है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और कानूनी प्रक्रिया इस मामले की दिशा तय करेगी।