सम्राट कैबिनेट में कई दिग्गजों को झटका, बदले सियासी समीकरण


 

बिहार की नई सरकार बनने के बाद सम्राट चौधरी कैबिनेट लगातार राजनीतिक चर्चा का केंद्र बनी हुई है। इस बार सम्राट चौधरी कैबिनेट में कई बड़े नेताओं को उम्मीद के मुताबिक जगह नहीं मिली, जबकि कुछ प्रभावशाली नेताओं के विभाग बदल दिए गए। बीजेपी के हाथों में सत्ता की कमान आने के बाद जहां पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह देखा गया, वहीं कई वरिष्ठ नेताओं के लिए यह मंत्रिमंडल विस्तार राजनीतिक झटके की तरह माना जा रहा है। अब कैबिनेट गठन के पीछे के राजनीतिक समीकरण और संगठनात्मक रणनीति पर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

विजय कुमार सिन्हा को बड़ा झटका?

पूर्व डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा इस बार सबसे ज्यादा चर्चा में रहे। पिछली सरकार में उनके पास राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग जैसा प्रभावशाली मंत्रालय था। साथ ही वे उप मुख्यमंत्री भी थे।

नई कैबिनेट में उनका डिप्टी सीएम पद चला गया और उन्हें कृषि विभाग की जिम्मेदारी दी गई। राजनीतिक गलियारों में इसे उनके राजनीतिक कद में बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।

हालांकि कृषि विभाग किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा अहम मंत्रालय माना जाता है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इसे पहले जितना प्रभावशाली नहीं माना जाता रहा है।

जयंत राज मंत्रिमंडल से बाहर क्यों?

जेडीयू विधायक जयंत राज का नाम भी चर्चाओं में बना हुआ है। पहली बार विधायक बनने के बाद ही उन्हें मंत्री पद मिला था और वे ग्रामीण कार्य विभाग संभाल चुके हैं।

इस बार उम्मीद थी कि उन्हें फिर से कैबिनेट में जगह मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजनीतिक चर्चाओं में विभागीय प्रदर्शन और संगठनात्मक समीकरणों को इसकी वजह बताया जा रहा है।

हालांकि पार्टी की ओर से इस पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

स्वास्थ्य विभाग विवाद के बीच मंगल पांडेय बाहर

मंगल पांडेय लंबे समय तक बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे। एनडीए सरकार बनने के बाद से वे लगातार मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे थे।

लेकिन इस बार स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी निशांत कुमार को दे दी गई और मंगल पांडेय को कैबिनेट में जगह नहीं मिली।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्वास्थ्य विभाग से जुड़े विवाद, विपक्ष के हमले और लगातार उठते सवालों का असर उनके राजनीतिक भविष्य पर पड़ा।

अशोक चौधरी के विभाग बदलने पर चर्चा

जेडीयू के वरिष्ठ नेता अशोक चौधरी भी इस बार चर्चा में हैं। वे पहले शिक्षा और भवन निर्माण जैसे अहम विभाग संभाल चुके हैं।

नई सरकार में उन्हें खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग दिया गया है। इसे लेकर राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं।

हालांकि सरकार या पार्टी नेतृत्व की ओर से विभागीय बदलाव को लेकर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की गई है।

कई नेताओं को नहीं मिली जगह

नई कैबिनेट में कई ऐसे चेहरे भी हैं, जिनके नाम को लेकर काफी चर्चा थी लेकिन उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया।

इनमें जनक राम, सुरेंद्र मेहता, जीवेश कुमार मिश्रा और महेश्वर हजारी जैसे नाम शामिल हैं।

जनक राम को कभी मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरों में भी गिना जाता था। वहीं महेश्वर हजारी विधानसभा के डिप्टी स्पीकर भी रह चुके हैं।

जीवेश कुमार मिश्रा का नाम भी चर्चा में था, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। उन पर पहले विवादों में रहने के आरोप भी लगे थे।

चेतन आनंद और रोमित कुमार को भी झटका

राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा चर्चा चेतन आनंद को लेकर हो रही है। बाहुबली नेता आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद ने विश्वासमत के दौरान एनडीए सरकार का समर्थन किया था।

इसके बाद माना जा रहा था कि उन्हें मंत्री पद मिल सकता है। लेकिन कैबिनेट सूची में उनका नाम नहीं आया।

इसी तरह अतरी विधायक रोमित कुमार भी मंत्रिमंडल से बाहर रह गए। वे पूर्व सांसद अरुण कुमार के बेटे हैं। राजनीतिक समीकरणों और जातीय संतुलन को इसके पीछे कारण माना जा रहा है।

बीजेपी और जेडीयू की नई रणनीति?

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नई कैबिनेट में सिर्फ अनुभव नहीं बल्कि सामाजिक और चुनावी संतुलन को भी प्राथमिकता दी गई है।

बीजेपी और जेडीयू दोनों आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए नए चेहरों और क्षेत्रीय संतुलन पर फोकस करती दिखाई दे रही हैं।

कई नेताओं को संगठनात्मक जिम्मेदारी देने की रणनीति भी चर्चा में है। ऐसे में मंत्रिमंडल से बाहर रहना राजनीतिक करियर का अंत नहीं माना जा रहा।

आगे और बदल सकते हैं समीकरण

बिहार की राजनीति में मंत्रिमंडल विस्तार और विभागीय बदलाव हमेशा बड़े राजनीतिक संकेत माने जाते हैं। अभी भी एक मंत्री पद खाली बताया जा रहा है, जिससे आगे और बदलाव की संभावना बनी हुई है।

राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो आने वाले महीनों में सरकार के प्रदर्शन, संगठन की रणनीति और आगामी चुनावी तैयारी के आधार पर कई नेताओं की भूमिका बदल सकती है।

फिलहाल नई कैबिनेट के जरिए बीजेपी और जेडीयू दोनों ने अपने राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।

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