रंजीत डॉन की कहानी फिर चर्चा में, पेपर लीक से राजनीति तक सफर


 

देश में NEET पेपर लीक और परीक्षा घोटालों की चर्चा के बीच रंजीत डॉन का नाम एक बार फिर सुर्खियों में है। रंजीत डॉन, जिन्हें रंजीत कुमार सिंह और सुमन कुमार के नाम से भी जाना जाता है, दो दशक पहले देश के चर्चित कथित परीक्षा माफियाओं में गिने जाते थे। रंजीत डॉन पर CAT, AIIMS और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के पेपर लीक कराने के आरोप लगे थे। NEET पेपर लीक विवाद के बाद पुराने मामलों की चर्चा तेज हुई तो रंजीत डॉन का नाम फिर सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में सामने आने लगा।

सीबीआई ने साल 2003 में उन्हें कथित पेपर लीक नेटवर्क से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया था। उस समय जांच एजेंसियों ने दावा किया था कि यह नेटवर्क कई राज्यों तक फैला हुआ था।

बिहार के गांव से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा नाम

रंजीत कुमार सिंह बिहार के नालंदा जिले के हिलसा प्रखंड के खड्डी लोदीपुर गांव के रहने वाले बताए जाते हैं। शुरुआती दौर में उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई की और दरभंगा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में दाखिला लिया था।

हालांकि बाद में उन पर मेडिकल प्रवेश के दौरान फर्जी दस्तावेज इस्तेमाल करने के आरोप लगे। यहीं से उनका नाम कथित परीक्षा फर्जीवाड़े और सॉल्वर गैंग से जोड़ा जाने लगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, धीरे-धीरे उन्होंने ऐसा नेटवर्क तैयार किया जो प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली कराने के आरोपों के कारण चर्चा में आया।

2003 में CBI कार्रवाई के बाद बढ़ी चर्चा

रंजीत डॉन पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर तब चर्चा में आए जब नवंबर 2003 में सीबीआई ने उन्हें दिल्ली से गिरफ्तार किया।

उन पर CAT, AIIMS और CBSE मेडिकल एंट्रेंस परीक्षा के पेपर लीक कराने के आरोप लगे थे। सीबीआई ने उस समय उनके समेत कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।

जांच एजेंसियों का दावा था कि नेटवर्क परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र हासिल करने, उम्मीदवारों की सेटिंग करने और सॉल्वर बैठाने जैसे काम करता था।

उस दौर में यह मामला देश के सबसे चर्चित शिक्षा घोटालों में शामिल हो गया था।

कैसे काम करता था कथित सॉल्वर गैंग

जांच रिपोर्ट्स के मुताबिक, कथित नेटवर्क दो तरीकों से काम करता था। पहला मॉडल पेपर लीक से जुड़ा था, जबकि दूसरा सॉल्वर गैंग पर आधारित बताया गया।

सॉल्वर गैंग में असली उम्मीदवार की जगह दूसरे लोग परीक्षा देने पहुंचते थे। इसके बदले लाखों रुपये लिए जाने के आरोप सामने आए थे।

बताया गया कि नेटवर्क से जुड़े लोग कोचिंग संस्थानों और कॉलेजों में ऐसे छात्रों की तलाश करते थे जो पैसे देकर परीक्षा पास करना चाहते थे।

जांच में संजीव और अभिषेक नाम के कुछ अन्य लोगों का भी जिक्र हुआ था, जिन्हें नेटवर्क का अहम हिस्सा बताया गया।

करोड़ों की कमाई और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप

रंजीत डॉन पर सिर्फ पेपर लीक ही नहीं, बल्कि कथित मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप भी लगे थे।

जांच एजेंसियों के अनुसार, उन्होंने हिमाचल प्रदेश में कई फार्मा कंपनियां रजिस्टर करवाई थीं। आरोप था कि इन कंपनियों के जरिए अवैध कमाई को वैध दिखाने की कोशिश की जाती थी।

उस समय मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि परीक्षा रैकेट से करोड़ों रुपये की कमाई होती थी। उनकी लग्जरी लाइफस्टाइल भी चर्चा का विषय बनी रही।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनावी हलफनामों में करोड़ों की संपत्ति, जमीन, बैंक बैलेंस और महंगी गाड़ियों का भी उल्लेख सामने आया था।

राजनीति में भी आजमाई किस्मत

रंजीत डॉन ने राजनीति में भी अपनी पहचान बनाने की कोशिश की। साल 2004 में उन्होंने बेगूसराय लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा।

दिलचस्प बात यह रही कि उस समय वह जेल में थे, लेकिन फिर भी उन्हें हजारों वोट मिले थे।

बाद में उन्होंने विधानसभा और विधान परिषद चुनावों में भी किस्मत आजमाई। हालांकि उन्हें चुनावी सफलता नहीं मिल सकी।

हलफनामों में उन्होंने खुद को डॉक्टर, बिजनेसमैन और सोशल वर्कर बताया था।

‘Why Cheat India’ से जुड़ी चर्चा

साल 2019 में रिलीज हुई Why Cheat India भी उस समय काफी चर्चा में रही थी। फिल्म में शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों और परीक्षा रैकेट जैसे मुद्दों को दिखाया गया था।

कई लोगों ने दावा किया था कि फिल्म की कुछ घटनाएं रंजीत डॉन जैसे मामलों से मिलती-जुलती हैं। हालांकि फिल्म निर्माताओं ने किसी एक व्यक्ति पर आधारित होने की पुष्टि नहीं की थी।

फिल्म में Emraan Hashmi ने मुख्य भूमिका निभाई थी।

NEET विवाद के बाद फिर क्यों चर्चा में आया नाम

हाल के NEET UG परीक्षा विवाद और पेपर लीक की चर्चाओं के बाद पुराने परीक्षा घोटालों का जिक्र फिर तेज हो गया है।

इसी वजह से रंजीत डॉन का नाम दोबारा सोशल मीडिया और समाचार चर्चाओं में सामने आने लगा। कई लोग उन्हें देश के शुरुआती बड़े कथित परीक्षा माफियाओं में गिनते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार सामने आ रहे परीक्षा विवाद देश की शिक्षा और भर्ती व्यवस्था में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

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