बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जन सुराज पार्टी की हार को लेकर लगातार चर्चा जारी है। जन सुराज पार्टी बिहार चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत सकी, जिसके बाद अब पार्टी की रणनीति और संगठनात्मक ढांचे पर सवाल उठ रहे हैं। जन सुराज पार्टी बिहार चुनाव में मिली इस करारी हार के पीछे क्या वजहें रहीं, इसे लेकर पार्टी के पूर्व कर्मचारी अफजल आलम ने कई गंभीर दावे किए हैं।
अफजल आलम ने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि पार्टी के भीतर फेवर्टिजम, स्थानीय नेताओं की अनदेखी और कमजोर टीम प्रबंधन ने पूरे अभियान को प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि यदि स्थानीय समझ और जमीनी नेतृत्व को सही अवसर मिलता, तो चुनावी नतीजे अलग हो सकते थे।
पूर्व कर्मचारी ने खोले संगठन के अंदरूनी राज
अफजल आलम ने बताया कि वह अप्रैल 2024 में प्रशांत किशोर की टीम से जुड़े थे और करीब 15 महीने तक डिजिटल कम्युनिकेशन टीम में काम किया। पदयात्रा के दौरान भी वह ग्राउंड लेवल पर सक्रिय रहे।
उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी में निर्णय लेने की प्रक्रिया काफी केंद्रीकृत थी। युवा और नए सदस्यों को केवल निर्देशों का पालन करने तक सीमित रखा गया। रणनीति बनाने या सुझाव देने का अवसर बहुत कम मिला।
अफजल के मुताबिक, इससे टीम के भीतर निराशा बढ़ी और कई प्रतिभाशाली लोग खुद को महत्वहीन महसूस करने लगे।
टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व पर सवाल
पूर्व कर्मचारी ने दावा किया कि टिकट वितरण में ईमानदार और नए चेहरों की जगह जाति, धर्म और संसाधनों को अधिक महत्व दिया गया। इससे स्थानीय कार्यकर्ताओं का भरोसा कमजोर हुआ।
उन्होंने कहा कि बिहार की सामाजिक और राजनीतिक समझ रखने वाले लोगों को अभियान की मुख्य रणनीति में शामिल नहीं किया गया। परिणामस्वरूप कई योजनाएं जमीनी हकीकत से दूर रहीं।
अफजल का मानना है कि स्थानीय मुद्दों को सही तरीके से समझने और जनता की प्राथमिकताओं के अनुसार रणनीति बनाने में पार्टी पीछे रह गई।
टीम मैनेजमेंट और HR सिस्टम पर गंभीर आरोप
अफजल आलम ने पार्टी की HR और टीम प्रबंधन व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि प्रतिभा के अनुसार जिम्मेदारियां तय नहीं की गईं। कई बार अनुभवी लोगों को ऐसे विभागों में भेजा गया जहां उनकी क्षमता का सही उपयोग नहीं हो सका।
उन्होंने आरोप लगाया कि केवल चापलूसी करने वाले लोगों को पहचान और प्रमोशन मिला, जबकि मेहनती कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किया गया। इससे टीम के भीतर असंतोष बढ़ा।
उनके अनुसार, समान काम करने वाले कर्मचारियों को अलग-अलग वेतन और अवसर दिए गए, जिससे संगठन में असमानता की भावना पैदा हुई।
अत्यधिक काम के दबाव से बढ़ा मानसिक तनाव
पूर्व कर्मचारी ने दावा किया कि टीम पर जरूरत से ज्यादा काम का दबाव डाला गया। दिनभर फील्ड में काम करने के बाद देर रात तक मीटिंग और डेटा वर्क करना पड़ता था।
उन्होंने कहा कि लगातार लंबे समय तक काम करने से टीम के सदस्यों में मानसिक थकान और तनाव बढ़ गया। इसका असर अभियान की गुणवत्ता और फील्ड प्रदर्शन पर भी पड़ा।
अफजल के मुताबिक, यही कारण था कि उन्होंने अगस्त 2025 में चुनाव से पहले ही नौकरी छोड़ने का फैसला लिया।
एक ही काम कई टीमों से कराने का आरोप
अफजल ने यह भी कहा कि संगठन में समन्वय की कमी थी। एक ही काम अलग-अलग टीमों को बार-बार सौंपा गया, लेकिन पहले किए गए काम को आगे नहीं बढ़ाया गया।
इससे समय और संसाधनों की बर्बादी हुई। कार्यकर्ताओं में चिड़चिड़ापन बढ़ा और अभियान की समग्र रणनीति प्रभावित हुई।
उन्होंने कहा कि यदि टीमों के बीच बेहतर तालमेल होता, तो संसाधनों का उपयोग अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता था।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में क्यों अहम हैं ये दावे?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बिहार जैसे राज्य में केवल बड़ी रणनीति या प्रचार अभियान पर्याप्त नहीं होते। मजबूत संगठन, स्थानीय समीकरण और कार्यकर्ताओं का भरोसा चुनावी सफलता में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
जन सुराज पार्टी को लेकर आए ये आरोप इसलिए भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं क्योंकि पार्टी ने खुद को पारंपरिक राजनीति से अलग विकल्प के रूप में पेश किया था।
हालांकि, इन आरोपों पर अभी तक प्रशांत किशोर या जन सुराज पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
