बिहार स्कूल नामांकन अभियान 2026 को लेकर शिक्षा विभाग ने बड़ा फैसला लिया है। बिहार school enrollment campaign के तहत अब 6 से 14 वर्ष तक का कोई भी बच्चा विद्यालय से बाहर नहीं रहेगा। बिहार school enrollment campaign को सफल बनाने के लिए राज्यभर में 31 मई तक विशेष नामांकन अभियान चलाया जाएगा। शिक्षा विभाग ने सभी जिलों को निर्देश दिया है कि हर बच्चे का सरकारी विद्यालय में दाखिला सुनिश्चित किया जाए।
विभाग के अनुसार, पहले चलाए गए अभियान के बावजूद कई बच्चे अब भी स्कूलों में नामांकन से वंचित हैं। इसी वजह से अब अभियान की अवधि बढ़ाकर इस महीने के अंत तक कर दी गई है।
घर-घर सर्वे कर बच्चों का कराया जाएगा दाखिला
प्राथमिक शिक्षा निदेशक विक्रम विरकर ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को पत्र जारी कर स्पष्ट निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा है कि गृहवार सर्वेक्षण के जरिए स्कूल से बाहर रह रहे बच्चों की पहचान की जाए।
इसके बाद संबंधित बच्चों का उनके पोषक क्षेत्र के सरकारी विद्यालयों में नामांकन कराया जाएगा। विभाग चाहता है कि राज्य में 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग का कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।
अधिकारियों को यह भी कहा गया है कि नामांकन प्रक्रिया की नियमित निगरानी करें और स्थानीय स्तर पर अभियान को गंभीरता से लागू करें।
पहले भी चला था 30 दिनों का विशेष अभियान
शिक्षा विभाग ने नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 की शुरुआत में भी विशेष नामांकन अभियान चलाया था। यह अभियान करीब 30 दिनों तक चला था।
उस दौरान खासतौर पर कक्षा 1, कक्षा 6 और कक्षा 9 में बच्चों का दाखिला कराया गया। सरकार का उद्देश्य था कि नए सत्र की शुरुआत में अधिकतम बच्चों को स्कूलों से जोड़ा जाए।
हालांकि, विभागीय समीक्षा में यह सामने आया कि बड़ी संख्या में बच्चे अभी भी नामांकन प्रक्रिया से बाहर हैं। इसके बाद विभाग ने अभियान को आगे बढ़ाने का फैसला लिया।
कम नामांकन वाले स्कूलों से मांगा जाएगा जवाब
शिक्षा विभाग अब उन विद्यालयों पर भी नजर रखेगा जहां पिछले साल की तुलना में इस बार कम नामांकन हुआ है।
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2025-26 के मुकाबले जिन स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या घटी है, उनसे स्पष्टीकरण मांगा जाएगा।
यदि संबंधित विद्यालय संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए, तो विभाग कार्रवाई भी कर सकता है। इससे यह स्पष्ट संकेत मिला है कि सरकार अब नामांकन को लेकर ज्यादा सख्ती बरतने के मूड में है।
शिक्षा से बाहर बच्चों की पहचान बनी बड़ी चुनौती
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में कई बच्चे अब भी स्कूल नहीं पहुंच पा रहे हैं। इसके पीछे आर्थिक स्थिति, पलायन, जागरूकता की कमी और पारिवारिक कारण जैसी समस्याएं मानी जाती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ नामांकन कराना पर्याप्त नहीं है। बच्चों को नियमित रूप से स्कूल से जोड़कर रखना भी बड़ी चुनौती है।
इसी वजह से शिक्षा विभाग अब स्थानीय शिक्षकों, पंचायत प्रतिनिधियों और समुदाय स्तर पर भी सहयोग लेने की योजना बना रहा है।
सरकार की प्राथमिकता में बुनियादी शिक्षा
राज्य सरकार लगातार प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को मजबूत करने पर जोर दे रही है। सरकारी स्कूलों में सुविधाओं के विस्तार और शिक्षकों की नियुक्ति के साथ अब नामांकन पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि शुरुआती शिक्षा किसी भी बच्चे के भविष्य की नींव होती है। यदि 6 से 14 वर्ष तक के बच्चे स्कूल से बाहर रहते हैं, तो इसका असर लंबे समय तक पड़ सकता है।
ऐसे में यह अभियान शिक्षा के अधिकार कानून और सार्वभौमिक शिक्षा लक्ष्य को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
अभिभावकों की भूमिका भी होगी अहम
शिक्षा विभाग ने अभिभावकों से भी अपील की है कि वे बच्चों को नियमित रूप से विद्यालय भेजें। कई बार नामांकन होने के बाद भी बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि परिवार और स्कूल मिलकर काम करें तो ड्रॉपआउट की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
सरकार अब यह सुनिश्चित करना चाहती है कि हर बच्चा स्कूल पहुंचे और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा रहे।
आने वाले दिनों में बढ़ सकती है निगरानी
सूत्रों के मुताबिक, विभाग आने वाले समय में नामांकन और उपस्थिति दोनों की डिजिटल मॉनिटरिंग भी बढ़ा सकता है।
इससे यह पता लगाने में आसानी होगी कि किन क्षेत्रों में बच्चे अब भी शिक्षा से दूर हैं। साथ ही योजनाओं का असर भी बेहतर तरीके से मापा जा सकेगा।
फिलहाल शिक्षा विभाग का फोकस 31 मई तक अधिक से अधिक बच्चों का नामांकन सुनिश्चित करने पर है।
