पटना:
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। तेजस्वी यादव को राजद का कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पार्टी के अंदर और बाहर कई तरह के सवाल खड़े हो गए हैं। इस फैसले पर लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य की टिप्पणी ने सियासी बहस को और तेज कर दिया है। रोहिणी आचार्य ने इसे “सियासत के शिखर पुरुष की गौरवशाली पारी का पटाक्षेप” बताया, यानी एक युग का अंत।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि
- क्या अब लालू यादव का राजद पर दबदबा खत्म हो गया है?
- क्या उन्हें जबरन राजनीतिक रिटायरमेंट की ओर धकेला जा रहा है?
- क्या वे अब सिर्फ नाम के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह जाएंगे?
राजद: सिर्फ एक पार्टी नहीं, लालू यादव की राजनीतिक पहचान
राजद केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि लालू यादव की राजनीतिक शक्ति और संघर्ष का प्रतीक रहा है।
प्रधानमंत्री और अपने ही दल के दिग्गज नेताओं को चुनौती देकर लालू यादव ने राष्ट्रीय जनता दल की स्थापना की थी।
चारा घोटाले में नाम आने, जेल जाने और चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित होने के बावजूद राजद बिहार की राजनीति में ताकत बना रहा।
ऐसे नेता को केवल औपचारिक भूमिका में सीमित करना, कई राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, एक युग के अंत जैसा है।
क्या लालू यादव अब शक्तिहीन हो गए हैं?
यदि लालू यादव केवल नाममात्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह जाते हैं, तो पार्टी की वास्तविक सत्ता किसके पास होगी?
तेजस्वी यादव के पास?
इस पर भी रोहिणी आचार्य ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने तेजस्वी यादव को ‘कठपुतली कार्यकारी अध्यक्ष’ करार दिया है।
रोहिणी आचार्य के अनुसार, पार्टी की असली ताकत अब “गिरोह-ए-घुसपैठ” के हाथों में जा सकती है, जिनके नामों को लेकर वे पहले भी संकेत दे चुकी हैं।
अगर तेजस्वी सिर्फ चेहरा बने तो राजद का क्या होगा?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि तेजस्वी यादव को स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति नहीं मिली, तो
25 विधायकों वाली पार्टी आगे बढ़ने के बजाय सिमट सकती है।
ऐसी स्थिति में राजद का संगठनात्मक ढांचा कमजोर पड़ सकता है।
संयोग से बने थे जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष
1990 के बाद लालू यादव बिहार के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो चुके थे, लेकिन जनवरी 1996 तक वे राष्ट्रीय राजनीति के बड़े खिलाड़ी नहीं बने थे।
जनवरी 1996 में हवाला कांड में जनता दल अध्यक्ष एस.आर. बोम्मई का नाम आने के बाद उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया।
इसके बाद 29 जनवरी 1996 को लालू यादव को जनता दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया।
अध्यक्ष बनने के तीन महीने बाद शुरू हुआ संकट
मार्च 1996 में पटना हाईकोर्ट ने चारा घोटाले की जांच सीबीआई को सौंप दी।
इसके बाद लालू यादव कानूनी संकट में घिर गए, लेकिन वे न तो मुख्यमंत्री पद छोड़ना चाहते थे और न ही पार्टी अध्यक्ष का पद।
चार्जशीट के बाद बढ़ा इस्तीफे का दबाव
23 जून 1997 को सीबीआई ने चारा घोटाले में चार्जशीट दाखिल की।
उस समय इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री थे, जो लालू यादव के समर्थन से ही सत्ता में पहुंचे थे।
इसके बावजूद देश के कई बड़े नेता चाहते थे कि लालू यादव पद छोड़ दें।
जनता दल चुनाव और शरद यादव से टकराव
जुलाई 1997 में जनता दल के संगठनात्मक चुनाव की घोषणा हुई।
शरद यादव ने अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया।
लालू यादव ने चुनाव का विरोध किया, लेकिन पार्टी के अधिकांश राष्ट्रीय नेता उनके खिलाफ खड़े हो गए।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद लालू यादव को एहसास हो गया कि वे चुनाव हार सकते हैं।
प्रधानमंत्री को चुनौती और RJD का गठन
जब प्रधानमंत्री गुजराल ने शरद यादव को हटाने की लालू यादव की सलाह नहीं मानी,
तो 5 जुलाई 1997 को लालू यादव ने जनता दल तोड़कर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का गठन कर दिया।
1996 के लोकसभा चुनाव में बिहार से जनता दल के 22 सांसद चुने गए थे, जिनमें से
16 सांसद और 6 राज्यसभा सांसद लालू यादव के साथ राजद में आ गए।
संघर्षों से बनी पार्टी, लेकिन अब ‘पटाक्षेप’ की चर्चा
कानूनी संकटों और राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद लालू यादव ने राजद को दशकों तक मजबूत बनाए रखा।
आज उसी पार्टी में उनकी भूमिका सीमित होती दिख रही है, जिसे कई लोग लालू यादव की राजनीति का पटाक्षेप मान रहे हैं।
अब सवाल यही है—
क्या लालू युग वास्तव में समाप्त हो गया है, या यह सिर्फ सत्ता हस्तांतरण का दौर है?
