EWS बच्चों का एडमिशन अब राष्ट्रीय मिशन हो, निजी स्कूलों में 25% आरक्षण लागू करो', सुप्रीम कोर्ट का केंद्र-राज्यों को निर्देश

 EWS बच्चों का एडमिशन अब राष्ट्रीय मिशन हो, निजी स्कूलों में 25% आरक्षण लागू करो', सुप्रीम कोर्ट का केंद्र-राज्यों को निर्देश



सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना “राष्ट्रीय मिशन” होना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि निजी गैर-अल्पसंख्यक, अनुदान-रहित स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रभावी क्रियान्वयन केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है।

केंद्र और राज्यों को स्पष्ट नियम बनाने के निर्देश

न्यायमूर्ति पीएम नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने मंगलवार को केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे 25 प्रतिशत आरक्षण के प्रविधान को लागू करने के लिए स्पष्ट, बाध्यकारी और व्यावहारिक नियम एवं विनियम तैयार करें। पीठ ने कहा कि बिना स्पष्ट नियमों के संविधान के अनुच्छेद 21a और RTE अधिनियम का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।

2016 के प्रवेश विवाद से जुड़ा मामला

यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें एक व्यक्ति ने शिकायत की थी कि वर्ष 2016 में सीटें उपलब्ध होने के बावजूद उसके बच्चों को पड़ोस के स्कूल में RTE अधिनियम के तहत मुफ्त शिक्षा में प्रवेश नहीं मिला। बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऑनलाइन प्रक्रिया का पालन न करने के आधार पर याचिका खारिज कर दी थी।

ऑनलाइन प्रक्रिया बनी बड़ी बाधा

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ऑनलाइन आवेदन प्रणाली EWS बच्चों के लिए कई स्तरों पर बाधा बन रही है। डिजिटल निरक्षरता, भाषा संबंधी कठिनाइयां, हेल्पडेस्क की कमी, सीटों की जानकारी का अभाव और अस्पष्ट शिकायत निवारण व्यवस्था के कारण आरक्षित सीटें व्यवहार में कमजोर वर्ग तक नहीं पहुंच पा रही हैं।

अदालतों को भी ‘एक कदम अतिरिक्त’ चलने की जरूरत

पीठ ने कहा कि EWS Catagory के बच्चों को प्रवेश देना संबंधित सरकारों और स्थानीय प्राधिकरणों का दायित्व है। इसके साथ ही, अदालतों को भी ऐसे मामलों में अभिभावकों को त्वरित और प्रभावी राहत देने के लिए “एक कदम अतिरिक्त” चलना चाहिए, ताकि बच्चों का शिक्षा का अधिकार सुरक्षित रह सके।

RTE और संविधान के उद्देश्य पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि स्पष्ट नियम नहीं बनाए गए, तो संविधान के अनुच्छेद 21a (शिक्षा का अधिकार) और RTE अधिनियम की धारा 12(1)(c) का उद्देश्य निष्प्रभावी हो जाएगा। इसलिए, आरटीई अधिनियम की धारा 38 के तहत एनसीपीसीआर, राज्य बाल अधिकार आयोगों और सलाहकार परिषदों से परामर्श कर नियम बनाए जाने चाहिए।

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