राज्यपाल के गणतंत्र दिवस भाषण ने खोल दिए सियासत के नए मायने
पटना:
बिहार की राजनीति में लंबे समय से चर्चा में रही नौकरी और रोजगार की बहस अब केवल चुनावी नारा नहीं, बल्कि सरकार की नीति बनती दिख रही है। 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का संबोधन कुछ ऐसा ही संकेत देता नजर आया, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता तक को चौंका दिया।
तिरंगा फहराने के बाद अपने भाषण में राज्यपाल ने साफ शब्दों में कहा कि नीतीश सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता युवाओं को रोजगार देना है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और दोनों उपमुख्यमंत्रियों की मौजूदगी में उन्होंने ऐलान किया कि बिहार सरकार मिशन मोड में काम कर रही है, ताकि 2030 तक एक करोड़ युवाओं को नौकरी और स्वरोजगार से जोड़ा जा सके।
2030 तक एक करोड़ नौकरी और रोजगार का लक्ष्य
राज्यपाल ने अपने संबोधन में बताया कि बिहार सरकार अब केवल खाली पदों को भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि नए पदों के सृजन पर भी जोर दे रही है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि:
- अब तक करीब 10 लाख सरकारी नौकरियां दी जा चुकी हैं
- लगभग 40 लाख लोगों को रोजगार के अवसर मिले हैं
सरकार का लक्ष्य है कि अगले कुछ वर्षों में इस संख्या को और बढ़ाया जाए, ताकि राज्य के अधिकतर परिवारों तक स्थायी आय का स्रोत पहुंचे।
क्या हर परिवार को मिलेगी सरकारी नौकरी?
राज्यपाल के भाषण के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या बिहार के हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी मिलेगी?
हालांकि सरकार ने सीधे तौर पर ऐसा कोई वादा नहीं किया है, लेकिन संकेत साफ हैं कि:
- रोजगार को नीति का केंद्र बनाया जा रहा है
- सरकारी नौकरी के साथ-साथ स्वरोजगार और निजी क्षेत्र को भी बढ़ावा दिया जाएगा
- स्किल डेवलपमेंट और स्टार्टअप पर फोकस बढ़ेगा
यानी लक्ष्य केवल सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि रोजगार के हर संभावित रास्ते को खोलना है।
तेजस्वी यादव ने पहले सेट किया था नौकरी का एजेंडा
बिहार में रोजगार की राजनीति की शुरुआत दरअसल तेजस्वी यादव के उस चुनावी वादे से मानी जाती है, जिसने पूरे चुनावी माहौल को बदल दिया था। विधानसभा चुनाव से पहले तेजस्वी यादव ने ऐलान किया था कि:
- सत्ता में आने के 20 महीनों के भीतर
- हर ऐसे परिवार के एक सदस्य को
- सरकारी नौकरी दी जाएगी, जिसके पास कोई स्थायी रोजगार नहीं है
तेजस्वी ने इसे ‘नौकरी का नवजागरण’ और ‘आर्थिक न्याय’ बताते हुए JOB (जश्न-ए-बिहार) का नारा दिया था।
हालांकि चुनाव में उनकी पार्टी को सत्ता नहीं मिली, लेकिन नौकरी का मुद्दा जनता के बीच इतना मजबूत हो गया कि अब मौजूदा सरकार भी इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर पा रही।
बजट को लेकर तब छिड़ी थी सियासी जंग
तेजस्वी यादव के वादे पर उस समय सत्ता पक्ष ने जमकर सवाल उठाए थे।
भाजपा और जेडीयू नेताओं का कहना था कि:
- बिहार का बजट
- इतनी बड़ी संख्या में सरकारी नौकरियां देने की अनुमति नहीं देता
- यह जनता को गुमराह करने वाला वादा है
तत्कालीन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने भी आंकड़ों पर सवाल खड़े किए थे। विपक्ष ने इसे ‘असंभव और अव्यवहारिक’ करार दिया था।
अब वही एजेंडा सरकार की नीति बनता दिख रहा
राज्यपाल के ताजा भाषण से यह साफ हो गया है कि जिस एजेंडे को कभी विपक्षी दलों ने अव्यवहारिक बताया था, वही अब सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल होता दिख रहा है।
बिहार में:
- करीब पौने तीन करोड़ परिवार हैं
- लगभग 20 लाख लोग सरकारी नौकरी में हैं
ऐसे में सरकार अब रोजगार सृजन को लेकर लंबी रणनीति पर काम कर रही है, ताकि सामाजिक और आर्थिक संतुलन बनाया जा सके।
राजनीति और भविष्य की दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि:
- रोजगार अब बिहार की राजनीति का मुख्य मुद्दा बन चुका है
- आने वाले चुनावों में यही मुद्दा केंद्र में रहेगा
- सरकार और विपक्ष दोनों इस पर अपनी-अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं
राज्यपाल का यह भाषण सिर्फ एक औपचारिक संबोधन नहीं, बल्कि बिहार की भविष्य की राजनीति और अर्थव्यवस्था का रोडमैप माना जा रहा है।
निष्कर्ष
गणतंत्र दिवस के मंच से दिया गया राज्यपाल का संदेश साफ है—
अब बिहार में विकास की राजनीति नौकरी और रोजगार के इर्द-गिर्द घूमेगी।
हालांकि यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि हर परिवार को सरकारी नौकरी मिलेगी, लेकिन इतना तय है कि आने वाले वर्षों में रोजगार सरकार की सबसे बड़ी पहचान बनने जा रहा है।
अब देखना यह होगा कि 2030 तक का यह सपना आंकड़ों में भी बदल पाता है या नहीं।
