बिहार में सरकारी कर्मचारियों की समयपालन व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में है। सरकारी कर्मचारियों की लेटलतीफी पर नियंत्रण को लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की नई सख्ती के बीच सरकारी कर्मचारियों की लेटलतीफी रोकने के लिए लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री काल का एक चर्चित किस्सा फिर सुर्खियों में आ गया है। 1990 के दशक में लालू यादव ने सचिवालय में देर से पहुंचने वाले कर्मचारियों पर अंकुश लगाने के लिए ऐसा कदम उठाया था, जिसकी चर्चा आज भी होती है।
अब जब राज्य सरकार ने बायोमेट्रिक उपस्थिति और वेतन कटौती जैसे नियम लागू करने की तैयारी की है, तब लालू यादव के उस पुराने प्रयोग की यादें फिर ताजा हो गई हैं।
जब सुबह 10 बजे बंद हो जाते थे सचिवालय के गेट
1990 के दशक में बिहार सचिवालय में कर्मचारियों की देरी से आने की समस्या लगातार बढ़ रही थी। उस दौर में एक कहावत भी काफी प्रचलित थी—“11 बजे लेट नहीं और 1 बजे से भेंट नहीं।”
बताया जाता है कि जनता दरबार के दौरान कुछ लोगों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को इस समस्या से अवगत कराया। लोगों की शिकायत थी कि अधिकारी और कर्मचारी समय पर कार्यालय नहीं पहुंचते, जिससे आम नागरिकों के काम प्रभावित होते हैं।
इसके बाद लालू यादव ने एक सख्त प्रशासनिक निर्णय लिया। उन्होंने निर्देश दिया कि सुबह ठीक 10 बजे सचिवालय के सभी प्रवेश द्वार बंद कर दिए जाएं।
दीवार फांदकर दफ्तर पहुंचते थे कर्मचारी
अगले ही दिन से इस आदेश को लागू कर दिया गया। परिणाम यह हुआ कि जो कर्मचारी 10 बजे के बाद सचिवालय पहुंचे, उन्हें अंदर जाने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशने पड़े।
कई कर्मचारी और अधिकारी सचिवालय की चारदीवारी फांदने की कोशिश करते दिखाई देते थे। कुछ लोग सफल हो जाते थे, जबकि कई गिर भी जाते थे।
उस समय सचिवालय परिसर का यह दृश्य काफी चर्चा का विषय बन गया था। बताया जाता है कि ऐसी तस्वीरें सामने आने पर लालू यादव भी कई बार हंसते हुए प्रतिक्रिया देते थे।
हालांकि इस कदम का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों को समय की अहमियत समझाना और कार्यालयों में अनुशासन स्थापित करना था।
लालू यादव का मकसद क्या था?
लालू यादव का मानना था कि यदि अधिकारी और कर्मचारी समय पर कार्यालय पहुंचेंगे तो जनता के काम भी तेजी से होंगे।
उनकी सोच थी कि सचिवालय में कार्य संस्कृति बेहतर बने और आम लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर कम लगाने पड़ें।
इसलिए गेट बंद करने का निर्णय केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं था, बल्कि प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने का एक प्रयास भी माना गया।
राजनीतिक और प्रशासनिक जानकारों के अनुसार उस समय यह कदम काफी चर्चित रहा और लंबे समय तक लोगों के बीच इसकी चर्चा होती रही।
अब सम्राट चौधरी ने अपनाया हाईटेक मॉडल
करीब तीन दशक बाद बिहार में कर्मचारियों की समयपालन व्यवस्था को लेकर फिर सख्ती दिखाई जा रही है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सरकारी कार्यालयों में बेहतर कार्य संस्कृति विकसित करने के लिए नया नियम लागू करने का संकेत दिया है। इसके तहत लगभग 10 लाख सरकारी कर्मचारियों को समय पर कार्यालय पहुंचना होगा।
नई व्यवस्था में बायोमेट्रिक अटेंडेंस को अनिवार्य बनाया जा रहा है। सभी कर्मचारियों को प्रतिदिन डिजिटल उपस्थिति दर्ज करनी होगी।
सरकार का मानना है कि इससे कार्यालयों में पारदर्शिता बढ़ेगी और कर्मचारियों की उपस्थिति का वास्तविक रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा।
लेटलतीफी पर वेतन कटौती का प्रावधान
नए नियमों के अनुसार यदि कोई कर्मचारी बार-बार देर से कार्यालय पहुंचता है या निर्धारित प्रक्रिया के तहत उपस्थिति दर्ज नहीं करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
सरकार ने संकेत दिया है कि लगातार नियमों का उल्लंघन करने वाले कर्मचारियों के वेतन पर भी असर पड़ सकता है।
इस कदम का उद्देश्य दंड देना नहीं बल्कि कार्यालयों में समयबद्ध कार्य संस्कृति विकसित करना बताया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक आधारित निगरानी से सरकारी कार्यालयों की कार्यक्षमता बढ़ सकती है और जनता को सेवाएं समय पर मिल सकती हैं।
बदलते दौर में अनुशासन का नया मॉडल
लालू यादव के दौर में जहां गेट बंद कर कर्मचारियों को समय पर आने का संदेश दिया गया था, वहीं आज डिजिटल तकनीक के जरिए उसी लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश हो रही है।
दोनों मॉडल अलग-अलग समय और परिस्थितियों के अनुरूप हैं, लेकिन उद्देश्य एक ही है—सरकारी कार्यालयों में जवाबदेही और बेहतर कार्य संस्कृति सुनिश्चित करना।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बायोमेट्रिक आधारित नई व्यवस्था सरकारी विभागों में कितना प्रभावी बदलाव ला पाती है।
