केरल में कैसे बना RJD का आधार? जानें 40 साल की पूरी कहानी
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👉 WhatsApp से जुड़ेंकेरल में RJD का आधार कैसे बना, यह सवाल अक्सर उठता है। केरल में RJD का आधार समझने के लिए हमें करीब 40–50 साल पीछे जाना होगा। दरअसल, यह कहानी सिर्फ राजनीति नहीं बल्कि समाजवादी आंदोलन, पुराने रिश्तों और दलों के विलय की एक लंबी प्रक्रिया से जुड़ी है। बिहार की क्षेत्रीय पार्टी मानी जाने वाली राष्ट्रीय जनता दल ने कैसे दक्षिण भारत के केरल में अपनी मौजूदगी बनाई, इसकी जड़ें पुराने राजनीतिक घटनाक्रम में छिपी हैं।
यह सफर कई नेताओं, विचारधाराओं और गठबंधनों के उतार-चढ़ाव से होकर गुजरा है।
समाजवादी आंदोलन से शुरू हुई कहानी
इस कहानी की शुरुआत समाजवादी राजनीति से होती है।
केरल के नेता एमपी वीरेन्द्र कुमार एक मजबूत समाजवादी नेता थे और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे। उस समय इस पार्टी का मजबूत आधार बिहार में था।
इसी वजह से वीरेन्द्र कुमार के बिहार के नेताओं से करीबी संबंध बने, जो आगे चलकर अहम साबित हुए।
लालू यादव से कैसे बढ़ी नजदीकी?
1977 में जनता पार्टी के गठन के बाद वीरेन्द्र कुमार केरल में सक्रिय रहे। बाद में जब जनता दल बना, तो वे भी उसमें शामिल हो गए।
1996 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कोझिकोड सीट से जीत दर्ज की। उस समय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू यादव थे।
यहीं से दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक और व्यक्तिगत संबंध मजबूत हुए। वीरेन्द्र कुमार केंद्र सरकार में मंत्री भी बने और इसी दौरान दोनों के रिश्ते और गहरे हुए।
जदयू और फिर अलग दल का गठन
समय के साथ जनता दल का विभाजन हुआ और कई नई पार्टियां बनीं।
वीरेन्द्र कुमार ने सोशलिस्ट जनता (डेमोक्रेटिक) नाम से अपनी पार्टी बनाई। बाद में 2014 में उन्होंने अपनी पार्टी का विलय शरद यादव की अगुवाई वाली जदयू में कर दिया।
लेकिन 2018 में राजनीतिक परिस्थितियों के कारण शरद यादव अलग हो गए और लोकतांत्रिक जनता दल (LJD) का गठन हुआ। वीरेन्द्र कुमार भी उनके साथ इस नए दल में शामिल हो गए।
वीरेन्द्र कुमार के निधन के बाद बदला समीकरण
2020 में वीरेन्द्र कुमार के निधन के बाद उनके बेटे एमवी श्रेयम्स कुमार ने पार्टी की जिम्मेदारी संभाली।
इसके बाद 2023 में शरद यादव का भी निधन हो गया, जिससे पार्टी के भविष्य को लेकर नए निर्णय लेने की जरूरत पड़ी।
इसी दौरान RJD नेतृत्व ने पुराने संबंधों को आधार बनाकर एलजेडी को अपने साथ जोड़ने की पहल की।
LJD का RJD में विलय और बड़ा राजनीतिक असर
लंबी बातचीत के बाद 12 अक्टूबर 2023 को लोकतांत्रिक जनता दल का RJD में विलय हो गया।
इस मौके पर तेजस्वी यादव, अब्दुल बारी सिद्दीकी और मनोज झा जैसे नेता केरल पहुंचे थे।
इस विलय का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि RJD को केरल में सीधे एक विधायक मिल गया। केपी मोहनन, जो पहले LJD से थे, RJD में शामिल हो गए।
2026 चुनाव में RJD की स्थिति
विलय के बाद RJD ने केरल में अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाई।
2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारे। इनमें से एक सीट पर जीत हासिल हुई।
कुथुपरम्बा सीट पर RJD उम्मीदवार पीके प्रवीण ने जीत दर्ज कर पार्टी की मौजूदगी को बनाए रखा।
केरल में RJD की वर्तमान भूमिका
आज केरल में RJD, वामपंथी गठबंधन (LDF) का हिस्सा है।
यहां पार्टी कांग्रेस के खिलाफ अलग गठबंधन में चुनाव लड़ती है, जो बिहार की राजनीति से अलग तस्वीर पेश करता है।
इससे साफ होता है कि क्षेत्रीय दल भी समय और परिस्थिति के अनुसार अपनी रणनीति बदलते हैं।
क्यों अहम है यह राजनीतिक यात्रा?
केरल में RJD की मौजूदगी दिखाती है कि भारतीय राजनीति में रिश्ते और विचारधाराएं सीमाओं से परे जा सकती हैं।
यह सिर्फ एक राज्य की पार्टी का विस्तार नहीं, बल्कि दशकों पुराने राजनीतिक संबंधों का परिणाम है।
भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि RJD केरल में अपनी पकड़ को कितना मजबूत कर पाती है।
