रितु जायसवाल के भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल होने के बाद बिहार की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। रितु जायसवाल ने मीडिया से बातचीत के दौरान राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नेता तेजस्वी यादव की कार्यशैली पर सवाल उठाए और पार्टी में कार्यकर्ताओं की अनदेखी को चुनावी नुकसान का बड़ा कारण बताया।
उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल की मजबूती उसके जमीनी कार्यकर्ताओं से होती है। यदि कार्यकर्ताओं की भावनाओं और सुझावों को महत्व नहीं दिया जाएगा तो संगठन कमजोर पड़ सकता है।
कार्यकर्ताओं से दूरी को बताया आरजेडी की बड़ी कमजोरी
मीडिया से बातचीत में रितु जायसवाल ने कहा कि उनकी नाराजगी केवल टिकट को लेकर नहीं थी, बल्कि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा को लेकर थी। उन्होंने दावा किया कि जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की आवाज समय रहते सुनी जाती तो हालात अलग हो सकते थे।
रितु ने कहा कि नेताओं को लगातार कार्यकर्ताओं के संपर्क में रहना चाहिए। उनके अनुसार, कार्यकर्ताओं की समस्याओं और भावनाओं को समझना किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए बेहद जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर पार्टी नेतृत्व जमीनी स्तर के लोगों से दूर हो जाए तो उसका असर चुनावी परिणामों पर भी दिखाई देता है।
तेजस्वी यादव को दी सुधार की सलाह
रितु जायसवाल ने तेजस्वी यादव को सलाह देते हुए कहा कि उन्हें अपने कार्यकर्ताओं के लिए दरवाजे खुले रखने चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक नेतृत्व की सफलता केवल जनसभाओं से नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के साथ संवाद से भी तय होती है।
उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का उदाहरण देते हुए कहा कि लालू यादव की पहचान आम कार्यकर्ताओं और गरीब लोगों से सीधे जुड़ाव की रही है। यही वजह थी कि कार्यकर्ताओं को सम्मान और अपनापन महसूस होता था।
रितु का कहना था कि पार्टी और नेतृत्व के बीच बनी दूरी को स्वीकार करना और उसमें सुधार करना जरूरी है।
रोहिणी आचार्या का नाम लेकर किया तंज
बातचीत के दौरान जब पत्रकारों ने रितु जायसवाल से उनके पुराने संबंधों को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने रोहिणी आचार्या का नाम लेते हुए तंज किया।
उन्होंने कहा कि तेजस्वी यादव उनके मुंहबोले भाई थे, जबकि रोहिणी आचार्या तो उनकी अपनी बहन जैसी थीं। इसके बाद उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि आखिर कमी कहां रह गई थी।
रितु की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब आरजेडी के भीतर चुनावी हार और संगठनात्मक मुद्दों को लेकर पहले भी कई तरह की चर्चाएं सामने आती रही हैं।
क्यों बनीं बागी, कैसे पहुंचीं बीजेपी तक?
सीतामढ़ी जिले की सिंहवानी पंचायत की मुखिया के रूप में पहचान बनाने वाली रितु जायसवाल लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रही हैं।
वर्ष 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने परिहार सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें भाजपा उम्मीदवार गायत्री देवी से करीबी मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा।
इसके बाद आरजेडी ने उन्हें महिला मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें शिवहर सीट से उम्मीदवार बनाया, जहां उन्हें हार मिली।
हालांकि 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले स्थिति बदल गई। बताया गया कि आरजेडी ने उन्हें परिहार सीट के बजाय किसी अन्य सीट से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया। इस फैसले से असहमत होकर रितु जायसवाल निर्दलीय मैदान में उतर गईं।
निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उन्होंने मजबूत प्रदर्शन किया और दूसरे स्थान पर रहीं, जबकि आरजेडी उम्मीदवार तीसरे स्थान पर सिमट गईं। इसके बाद उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ती गई।
बिहार की राजनीति में क्या हैं इसके मायने?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रितु जायसवाल का बीजेपी में जाना केवल दल-बदल की घटना नहीं है, बल्कि यह बिहार की राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत भी माना जा सकता है।
रितु का स्थानीय स्तर पर प्रभाव और पंचायत राजनीति से लेकर विधानसभा चुनाव तक का अनुभव उन्हें एक पहचान देता है। ऐसे में आगामी राजनीतिक गतिविधियों पर उनकी भूमिका को लेकर भी नजरें बनी रहेंगी।
वहीं, आरजेडी के लिए यह घटनाक्रम संगठनात्मक मजबूती और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद जैसे मुद्दों पर नए सवाल खड़े कर सकता है।
