बिहार में MBBS एडमिशन को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट के जरिए मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने का मामला अब चर्चा में है। फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट बनाकर कई छात्रों ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में MBBS सीट हासिल कर ली। जांच में सामने आया कि कुछ छात्र कान से दिव्यांग होने का फर्जी प्रमाणपत्र लगाकर मेडिकल कॉलेज में दाखिल हुए और वर्षों तक पढ़ाई भी करते रहे। मामला सामने आने के बाद मेडिकल शिक्षा व्यवस्था और दस्तावेज जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
यह पूरा मामला गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज पूर्णिया से जुड़ा है, जहां एक छात्र के एडमिशन के बाद शुरू हुई जांच ने बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा कर दिया।
कैसे होता है दिव्यांग कोटे में मेडिकल एडमिशन?
देशभर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन के लिए NEET परीक्षा आयोजित होती है। मेडिकल सीटों का लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए आरक्षित रहता है।
अगर किसी मेडिकल कॉलेज में 100 सीटें हैं तो उनमें करीब पांच सीटें दिव्यांग श्रेणी के छात्रों के लिए तय होती हैं। इसी कोटे का गलत फायदा उठाने के आरोप सामने आए हैं।
दिव्यांग श्रेणी में हाथ, पैर, आंख, कान और अन्य शारीरिक समस्याओं के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किए जाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक सुनने की क्षमता कम होने का प्रमाणपत्र बनवाना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है।
कान से दिव्यांग बनने का खेल कैसे चला?
नियमों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की सुनने की क्षमता सामान्य से 40 प्रतिशत कम हो तो उसे श्रवण दिव्यांग श्रेणी में रखा जा सकता है।
आरोप है कि इसी नियम का इस्तेमाल फर्जी तरीके से किया गया। कई छात्रों ने कथित रूप से गलत या फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्र तैयार करवा लिए और दिव्यांग कोटे में मेडिकल सीट हासिल कर ली।
मामला तब उजागर हुआ जब 2025 में कान से दिव्यांग कोटे में चयनित एक छात्र एडमिशन के लिए मेडिकल कॉलेज पहुंचा। कॉलेज अधिकारियों को उसके व्यवहार और बातचीत के आधार पर शक हुआ।
जांच में कैसे खुला पूरा फर्जीवाड़ा?
शक होने के बाद कॉलेज प्रशासन ने छात्र के दिव्यांगता प्रमाणपत्र की जांच कराने का फैसला किया। जांच में पता चला कि छात्र का सर्टिफिकेट फर्जी था।
इसके बाद छात्र को गिरफ्तार कर लिया गया। यही से पूरे नेटवर्क की जांच शुरू हुई। कॉलेज प्रबंधन ने 2023 और 2024 बैच के उन सभी छात्रों के दस्तावेज दोबारा जांचने का फैसला किया, जिन्होंने कान की दिव्यांगता श्रेणी में एडमिशन लिया था।
जांच में कुल 10 छात्रों के प्रमाणपत्रों की जांच हुई। इनमें से 7 छात्रों के दस्तावेज फर्जी पाए गए।
दो साल तक मेडिकल की पढ़ाई करते रहे छात्र
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि 2023 बैच में एडमिशन लेने वाले कुछ छात्र करीब दो साल तक मेडिकल की पढ़ाई करते रहे और किसी को भनक तक नहीं लगी।
जब फर्जीवाड़ा सामने आया तो आरोपी छात्र कॉलेज छोड़कर फरार हो गए। कॉलेज प्रशासन ने सभी सात छात्रों का एडमिशन रद्द कर दिया।
इसके बाद मामले की जानकारी राज्य सरकार को भेजी गई। अब आगे की कार्रवाई को लेकर शिक्षा विभाग और जांच एजेंसियां सक्रिय हैं।
मेडिकल एडमिशन प्रक्रिया पर उठे सवाल
इस घटना ने मेडिकल एडमिशन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि दस्तावेजों की शुरुआत में ही गंभीर जांच होती तो इतना बड़ा फर्जीवाड़ा नहीं हो पाता।
कुछ लोगों का मानना है कि मेडिकल कॉलेजों में प्रमाणपत्र सत्यापन की प्रक्रिया को और मजबूत करने की जरूरत है। डिजिटल वेरिफिकेशन और मेडिकल बोर्ड की दोबारा जांच जैसे कदम भविष्य में ऐसे मामलों को रोक सकते हैं।
छात्रों और अभिभावकों में बढ़ी चिंता
NEET जैसी कठिन परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों और अभिभावकों के बीच इस मामले को लेकर नाराजगी देखी जा रही है।
छात्रों का कहना है कि फर्जी दस्तावेज के जरिए सीट लेने वाले उम्मीदवार मेहनती छात्रों का हक छीन लेते हैं। इससे पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक मेडिकल जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना बेहद जरूरी है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं होती तो कई फर्जी छात्र डॉक्टर बनकर सिस्टम का हिस्सा बन जाते।
आगे क्या हो सकती है कार्रवाई?
कॉलेज प्रशासन ने मामले की रिपोर्ट राज्य सरकार को भेज दी है। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि फर्जी प्रमाणपत्र कहां और कैसे बनाए गए।
संभावना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और खुलासे हो सकते हैं। यदि नेटवर्क बड़ा निकला तो कई अन्य कॉलेजों और छात्रों की भी जांच हो सकती है।
