बिहार की राजनीति में मजबूत पकड़ बनाने के बाद अब चिराग पासवान उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी सक्रिय नजर आ रहे हैं। यूपी चुनाव को लेकर चिराग पासवान की बढ़ती गतिविधियों ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (रामविलास) ने लखनऊ में बड़े पैमाने पर पोस्टर अभियान शुरू किया है, जिससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी में है। यूपी चुनाव से पहले चिराग पासवान का यह कदम सपा, बसपा और भाजपा समेत कई दलों के लिए नई चुनौती माना जा रहा है।
राजधानी लखनऊ में लगाए गए पोस्टरों और नए नारों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। खासकर दलित वोट बैंक को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
पोस्टर पॉलिटिक्स से यूपी में बढ़ी चर्चा
लखनऊ की प्रमुख सड़कों और कालीदास मार्ग के आसपास लगे पोस्टरों में लिखा गया नारा — “क्यों मांगे नेता उधार, जब अपना नेता है तैयार” — लोगों का ध्यान खींच रहा है।
यह नारा सीधे तौर पर दलित समाज को नया राजनीतिक विकल्प देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संदेश उन दलों पर निशाना है जो दलित राजनीति तो करते हैं, लेकिन नेतृत्व के लिए दूसरे चेहरों पर निर्भर रहते हैं।
Chirag Paswan की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) अब यूपी में संगठन विस्तार पर जोर दे रही है। पार्टी बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में जुटी है।
सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी
लोजपा (रामविलास) के सांसद Arun Bharti ने संकेत दिए हैं कि पार्टी उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति बना रही है।
पार्टी केवल बिहार सीमा से जुड़े जिलों तक सीमित नहीं रहना चाहती। उसका फोकस पूरे प्रदेश में दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने पर है।
अरुण भारती ने कहा कि पार्टी का उद्देश्य केवल सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना है। यही वजह है कि संगठन विस्तार पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
बसपा और सपा के वोट बैंक पर असर की चर्चा
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यूपी में चिराग पासवान की सक्रियता का सबसे ज्यादा असर बहुजन समाज पार्टी पर पड़ सकता है।
बीते कुछ वर्षों में बसपा का जनाधार कमजोर हुआ है। ऐसे में अगर गैर-जाटव और युवा दलित मतदाता चिराग पासवान की ओर आकर्षित होते हैं, तो बसपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
वहीं, समाजवादी पार्टी भी दलित वोटों को अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण के जरिए जोड़ने की कोशिश कर रही है।
Akhilesh Yadav की रणनीति 2024 लोकसभा चुनाव के सामाजिक समीकरण को आगे बढ़ाने की है। ऐसे में चिराग की मौजूदगी सपा के लिए भी चुनौती बन सकती है।
बीजेपी के लिए भी आसान नहीं होगी राह
हालांकि Narendra Modi सरकार में चिराग पासवान एनडीए के सहयोगी हैं, लेकिन यूपी में अलग राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने की कोशिश भाजपा के लिए भी चिंता का कारण बन सकती है।
बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में गैर-जाटव दलित वोटों में मजबूत पकड़ बनाई है। अगर लोजपा (रामविलास) इस वर्ग में प्रभाव बढ़ाती है, तो भाजपा के वोट समीकरण पर असर पड़ सकता है।
हालांकि भाजपा के पास पहले से कई बड़े दलित चेहरे मौजूद हैं। इनमें बेबी रानी मौर्य, असीम अरुण, कमलेश पासवान और दिनेश खटीक जैसे नेता शामिल हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा फिलहाल स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
सहयोगी दलों की भी बढ़ सकती है परेशानी
चिराग पासवान की रणनीति केवल बड़े दलों तक सीमित चुनौती नहीं मानी जा रही। इसका असर एनडीए के सहयोगी दलों पर भी पड़ सकता है।
Om Prakash Rajbhar और Sanjay Nishad जैसे नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में वोटों का बंटवारा संभव माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछड़े और वंचित वर्गों के मुद्दों पर अगर कई दल सक्रिय होते हैं, तो सामाजिक समीकरण जटिल हो सकते हैं।
मुकेश सहनी के पुराने मामले से हो रही तुलना
राजनीतिक गलियारों में चिराग पासवान की रणनीति की तुलना बिहार के नेता Mukesh Sahani से भी की जा रही है।
2022 यूपी विधानसभा चुनाव में सहनी की पार्टी वीआईपी ने भी चुनाव लड़ने की कोशिश की थी। उस दौरान भाजपा ने कड़ा रुख अपनाया था और बिहार में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले थे।
हालांकि बाद में Om Prakash Rajbhar ने बिहार में चुनाव लड़ा, लेकिन उस समय ऐसा विवाद सामने नहीं आया।
इस वजह से अब राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि यूपी चुनाव में चिराग पासवान की भूमिका आखिर किस दिशा में जाएगी।
यूपी चुनाव से पहले बढ़ेगी सियासी गर्मी
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी कुछ महीने बाकी हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है।
चिराग पासवान की सक्रियता ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि आने वाले समय में यूपी की राजनीति में नए सामाजिक समीकरण देखने को मिल सकते हैं।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि लोजपा (रामविलास) कितनी सीटों पर चुनाव लड़ती है और उसका असर किस दल के वोट बैंक पर सबसे ज्यादा पड़ता है।
