पश्चिम एशिया संकट: भारत में महंगाई बढ़ने का खतरा, रुपये पर दबाव गहरााया

 


भारत की अर्थव्यवस्था इस समय कई वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रही है। पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत का भुगतान संतुलन यानी Balance of Payment चर्चा में आ गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि मौजूदा हालात भारत के भुगतान संतुलन के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकते हैं। तेल, सोना और खाद जैसी जरूरी चीजों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जबकि विदेशी निवेशकों की निकासी और कमजोर निर्यात ने भी चिंता बढ़ा दी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर आम लोगों की जेब से लेकर देश की आर्थिक स्थिरता तक दिखाई दे सकता है।

क्या होता है भुगतान संतुलन और क्यों है जरूरी

भुगतान संतुलन यानी बैलेंस ऑफ पेमेंट किसी देश का आर्थिक हिसाब-किताब होता है। इससे पता चलता है कि देश में विदेशी मुद्रा कितनी आ रही है और कितनी बाहर जा रही है।

जब भारत दूसरे देशों को सामान बेचता है या विदेशी निवेश आता है, तब डॉलर जैसी विदेशी मुद्रा देश में आती है। वहीं तेल, सोना और मशीनों के आयात पर विदेशी मुद्रा बाहर जाती है।

अगर देश में आने वाला पैसा ज्यादा हो तो स्थिति मजबूत मानी जाती है। लेकिन जब बाहर जाने वाला पैसा अधिक हो जाए तो आर्थिक दबाव बढ़ने लगता है। यही चिंता इस समय भारत के सामने खड़ी है।

तीन बड़े झटकों से बढ़ा आर्थिक दबाव

भारत पर इस समय तीन बड़े आर्थिक दबाव एक साथ पड़ रहे हैं। पहला झटका अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, सोना और खाद की बढ़ती कीमतों का है। इससे आयात बिल लगातार बढ़ रहा है।

दूसरा बड़ा दबाव विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPI की निकासी है। विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं, जिससे शेयर बाजार और रुपये दोनों पर असर पड़ रहा है।

तीसरा झटका निर्यात में कमजोरी का है। आयात बढ़ रहा है लेकिन निर्यात उसी रफ्तार से नहीं बढ़ पा रहा। इससे व्यापार घाटा बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

आम लोगों पर कैसे पड़ेगा असर

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि भुगतान संतुलन बिगड़ने का सबसे बड़ा असर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर दिखाई देता है।

रुपया कमजोर होने से पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है। इसके साथ ही गैस सिलेंडर, खाने-पीने की चीजें, इलेक्ट्रॉनिक सामान और विदेश से आने वाले कई उत्पादों की कीमत बढ़ सकती है।

अगर डॉलर की मांग लगातार बढ़ती रही तो रुपया और कमजोर हो सकता है। इससे विदेश यात्रा, पढ़ाई और आयातित सामान पर खर्च भी बढ़ जाएगा।

पश्चिम एशिया संकट क्यों बना बड़ी चिंता

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव सिर्फ क्षेत्रीय संकट नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक होर्मुज स्ट्रेट में संकट और तेल सप्लाई प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में करीब 60 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है।

भारत अपनी जरूरत का लगभग 87 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसमें बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। इसके अलावा एलपीजी आयात और बड़ी मात्रा में मिलने वाला रेमिटेंस भी इसी क्षेत्र पर निर्भर है।

यानी अगर वहां हालात और बिगड़ते हैं तो भारत के आयात खर्च और महंगाई दोनों बढ़ सकते हैं।

क्या भारत इस संकट से निपटने के लिए तैयार है

हालांकि सरकार का मानना है कि भारत पहले की तुलना में अब ज्यादा मजबूत स्थिति में है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर करीब 701 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।

विशेषज्ञों के अनुसार मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी आर्थिक संकट के दौरान सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। इससे सरकार रुपये को स्थिर रखने और जरूरी आयात जारी रखने में सक्षम रहती है।

सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में इन्फ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल अर्थव्यवस्था और उत्पादन बढ़ाने पर भी फोकस किया है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से मुकाबला करने में मदद मिल सकती है।

आने वाले समय पर रहेगी नजर

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगले कुछ महीनों में तेल की कीमतें, वैश्विक निवेशकों का रुख और पश्चिम एशिया की स्थिति भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अहम फैक्टर होंगे।

अगर वैश्विक हालात स्थिर होते हैं तो भारत पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन लंबे समय तक संकट जारी रहने पर महंगाई और रुपये की कमजोरी बड़ी चुनौती बन सकती है।

फिलहाल सरकार और आर्थिक एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं ताकि किसी बड़े आर्थिक झटके से बचा जा सके।

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