बिहार में परिवारवाद पर सियासी संग्राम, निशांत की एंट्री से बढ़ी बहस

 


बिहार राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। बिहार राजनीति में परिवारवाद को लेकर शुरू हुई बहस अब निशांत कुमार की संभावित राजनीतिक एंट्री के बाद और तेज हो गई है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने एनडीए पर वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, जिसके बाद भाजपा और सहयोगी दलों के नेताओं ने लालू परिवार का उदाहरण देकर पलटवार शुरू कर दिया। अब बिहार में “योग्यता बनाम परिवारवाद” की बहस राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई है।

एनडीए नेताओं का कहना है कि निशांत कुमार की राजनीति में भागीदारी को परिवारवाद कहना सही नहीं है, जबकि विपक्ष इसे सत्ता में परिवार आधारित राजनीति का विस्तार बता रहा है।

तेजस्वी यादव के आरोप से बढ़ी राजनीतिक गर्मी

बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने एनडीए सरकार पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। उनके बयान के बाद सत्ता पक्ष के नेताओं ने तुरंत जवाबी हमला शुरू कर दिया।

भाजपा नेताओं ने कहा कि जो दल खुद लंबे समय से परिवार आधारित राजनीति करते रहे हैं, वे अब दूसरे दलों पर आरोप लगा रहे हैं। इसी मुद्दे को लेकर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने तेजस्वी यादव पर कई सवाल उठाए।

सियासी बयानबाजी के बाद यह मुद्दा अब बिहार की राजनीति में प्रमुख चर्चा बन चुका है।

संजय सरावगी ने लालू परिवार का दिया उदाहरण

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने कहा कि तेजस्वी यादव बिना तथ्यों के बयान दे रहे हैं। उन्होंने लालू यादव और राबड़ी देवी के राजनीतिक दौर का उदाहरण देते हुए विपक्ष पर निशाना साधा।

सरावगी ने कहा कि जब लालू यादव जेल गए थे, तब राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया गया, जबकि उन्हें राजनीति का अनुभव नहीं था।

उन्होंने यह भी कहा कि तेजस्वी यादव को कम उम्र और सीमित शैक्षणिक योग्यता के बावजूद उपमुख्यमंत्री बनाया गया था। साथ ही तेज प्रताप यादव को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई थी।

भाजपा नेताओं का दावा है कि निशांत कुमार का मामला इससे अलग है और उन्हें उनकी व्यक्तिगत योग्यता के आधार पर देखा जाना चाहिए।

निशांत कुमार की योग्यता पर NDA का जोर

संजय सरावगी ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार पढ़े-लिखे इंजीनियर हैं और वह अपनी क्षमता के दम पर राजनीति में जगह बना रहे हैं।

उन्होंने कहा कि निशांत ने अभी राजनीतिक जिम्मेदारी संभालना शुरू ही किया है, लेकिन विपक्ष ने पहले से ही उन पर टिप्पणी शुरू कर दी।

एनडीए नेताओं का मानना है कि किसी भी व्यक्ति को सिर्फ उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी योग्यता और काम के आधार पर आंका जाना चाहिए।

सरावगी ने दावा किया कि आने वाले समय में निशांत कुमार खुद को साबित करेंगे और प्रशासनिक समझ के जरिए अपनी अलग पहचान बनाएंगे।

परिवारवाद बनाम योग्यता की नई बहस

निशांत कुमार की संभावित सक्रिय राजनीति में एंट्री ने बिहार में नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है।

विपक्ष का कहना है कि राजनीतिक परिवारों से आने वाले नेताओं को प्राथमिकता मिलना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सही संकेत नहीं है। वहीं सत्ता पक्ष इसे व्यक्तिगत क्षमता और जनसमर्थन का मामला बता रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बिहार की राजनीति लंबे समय से परिवार आधारित नेतृत्व के आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच घूमती रही है।

अब यह बहस केवल नेताओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि सोशल मीडिया और आम जनता के बीच भी चर्चा का विषय बन गई है।

दिलीप जायसवाल और अशोक चौधरी ने भी दिया जवाब

बिहार सरकार के मंत्री दिलीप जायसवाल ने भी तेजस्वी यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें परिवारवाद की सही परिभाषा समझने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि एनडीए में केवल किसी परिवार से जुड़े होने के कारण नेतृत्व नहीं मिलता। उन्होंने समाजवादी राजनीति का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ दलों में सत्ता सीधे परिवार के भीतर स्थानांतरित होती रही है।

मंत्री अशोक चौधरी ने भी निशांत कुमार का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अगर सिर्फ परिवारवाद ही उद्देश्य होता, तो निशांत काफी पहले राजनीति में सक्रिय हो सकते थे।

अशोक चौधरी ने कहा कि निशांत कुमार ने सही समय का इंतजार किया और अब जनता के बीच अपनी भूमिका तय करने की कोशिश कर रहे हैं।

चुनावी माहौल में बढ़ सकता है राजनीतिक असर

विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहार में आगामी चुनावों को देखते हुए परिवारवाद का मुद्दा आगे भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बना रह सकता है।

विपक्ष इसे जनता के बीच बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश करेगा, जबकि एनडीए योग्यता और अनुभव के आधार पर जवाब देने की रणनीति अपना सकता है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि बिहार की राजनीति में व्यक्तिगत छवि, पारिवारिक पृष्ठभूमि और जनस्वीकृति तीनों अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में यह मुद्दा और अधिक गर्मा सकता है।

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