सुपौल में चौंकाने वाला घोटाला: मृत शिक्षक के नाम से ₹1 करोड़ एरियर निकासी, बड़ा अपडेट

 


मृत शिक्षक के नाम से ₹1 करोड़ एरियर निकासी

सुपौल मदरसा घोटाला का बड़ा खुलासा बिहार के सुपौल जिले में सामने आया है, जहां 7 साल पहले मर चुके शिक्षक के नाम पर एरियर राशि निकाल ली गई। यह सुपौल मदरसा घोटाला 6 अप्रैल को जनसुनवाई में शिकायत के बाद उजागर हुआ, जब मदरसा हासिमिया, छातापुर प्रखंड में वित्तीय अनियमितताओं की जांच शुरू हुई। आरोप है कि पूर्व हेडमास्टर और सहयोगियों ने जाली हस्ताक्षरों के जरिए सरकारी खजाने से करीब ₹1 करोड़ निकाल लिए। अधिकारियों ने जांच तेज कर दी है और दोषियों पर कार्रवाई की तैयारी है।


क्या है पूरा मामला?

सुपौल जिले के छातापुर प्रखंड अंतर्गत लक्ष्मीनियां पंचायत के बरमोतरा स्थित मदरसा हासिमिया में बड़ा वित्तीय घोटाला सामने आया है।

मदरसा के सचिव मो. कासिम ने आरोप लगाया है कि रिटायर और मृत शिक्षकों के नाम पर फर्जी तरीके से एरियर राशि निकाली गई।

इस घोटाले में सरकारी धन का दुरुपयोग कर करीब ₹1 करोड़ रुपये की निकासी की बात सामने आई है, जिससे प्रशासनिक तंत्र पर सवाल उठ रहे हैं।


7 साल पहले मर चुके शिक्षक के नाम पर निकासी

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिन शिक्षकों के नाम पर पैसे निकाले गए, उनमें से एक शिक्षक की मौत 7 साल पहले ही हो चुकी थी।

इसके बावजूद उनके नाम पर बैंक खाते सक्रिय रहे और उनमें सरकारी राशि ट्रांसफर होती रही।

यह न सिर्फ बैंकिंग सिस्टम बल्कि शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।


कैसे खुला घोटाले का राज?

इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब मदरसा के वर्तमान हेडमास्टर मो. अरशद और पूर्व हेडमास्टर मो. नाजिम अली के बीच विवाद हो गया।

विवाद बढ़ने पर सचिव मो. कासिम ने 6 अप्रैल को प्रमंडलीय आयुक्त की जनसुनवाई में लिखित शिकायत दर्ज कराई।

इसके बाद प्रशासन हरकत में आया और जांच के आदेश दिए गए।


जांच टीम पहुंची, रिकॉर्ड खंगाले

जांच के लिए डीपीओ स्थापना आलोक शेखर और बीईओ सह बीपीआरओ देश कुमार की टीम मदरसा पहुंची।

अधिकारियों ने दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठाकर दस्तावेजों की जांच की और हस्ताक्षरों का मिलान किया।

प्राथमिक जांच में कई दस्तावेजों में हस्ताक्षर मेल नहीं खाने की बात सामने आई है, जिससे फर्जीवाड़े की आशंका मजबूत हुई है।


MDM योजना में भी गड़बड़ी का शक

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी शिक्षक मध्याह्न भोजन (MDM) योजना का संचालन भी कर रहे थे।

इस योजना में भी अनियमितताओं के आरोप लगे हैं, जिससे घोटाले का दायरा और बड़ा हो सकता है।

मदरसे में वर्तमान में केवल दो शिक्षक कार्यरत हैं, फिर भी भारी एरियर भुगतान होना संदेह पैदा करता है।


प्रशासन सख्त, कार्रवाई तय

सुपौल के डीएम सावन कुमार ने मामले को गंभीरता से लिया है और स्पष्ट कहा है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

जांच रिपोर्ट के आधार पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

डीपीओ आलोक शेखर ने बताया कि पुराने रिकॉर्ड्स और हस्ताक्षरों का मिलान कर जल्द ही अंतिम रिपोर्ट सौंपी जाएगी।


आम लोगों पर क्या असर?

इस तरह के घोटाले से सरकारी योजनाओं पर लोगों का भरोसा कमजोर होता है।

“इस फैसले से लोगों को उम्मीद है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और सरकारी पैसे का सही उपयोग होगा।”

अगर समय रहते कार्रवाई नहीं होती, तो शिक्षा व्यवस्था और भी प्रभावित हो सकती है।


निष्कर्ष

सुपौल मदरसा घोटाला सिर्फ एक वित्तीय गड़बड़ी नहीं, बल्कि सिस्टम की बड़ी चूक को उजागर करता है।

अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर है, जिससे यह तय होगा कि इस पूरे खेल के पीछे कौन जिम्मेदार है और कितनी बड़ी साजिश रची गई।


Source: स्थानीय प्रशासनिक रिपोर्ट व जनसुनवाई शिकायत

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