लोकसभा में Women Reservation Bill को लेकर सियासी टकराव तेज हो गया है। Women Reservation Bill के पास न हो पाने के बाद बीजेपी सांसद Giriraj Singh ने कांग्रेस समेत विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोला है।
उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष महिलाओं को सशक्त नहीं करना चाहता और उनका रुख शुरू से ही महिला आरक्षण के खिलाफ रहा है।
इस मुद्दे पर अब राष्ट्रीय राजनीति में बयानबाजी और तेज होती दिख रही है।
गिरिराज सिंह का विपक्ष पर सीधा आरोप
Giriraj Singh ने कहा कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का इतिहास महिला आरक्षण के विरोध का रहा है।
उन्होंने दावा किया कि पहले भी जब महिला आरक्षण बिल लाया गया, तब विपक्ष ने इसका समर्थन नहीं किया।
उनके अनुसार, वर्तमान में भी विपक्ष ने इस बिल को पास होने से रोक दिया।
लोकसभा में क्यों पास नहीं हो सका बिल?
महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर सका।
संविधान संशोधन के लिए सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है।
वोटिंग के दौरान 298 सांसदों ने समर्थन किया, जबकि 230 ने विरोध में वोट दिया, जिससे बिल पारित नहीं हो पाया।
‘महिला विरोधी मानसिकता’ का आरोप
बीजेपी सांसद ने विपक्ष पर महिला विरोधी मानसिकता का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि विपक्ष नहीं चाहता कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़े।
उनका कहना था कि यह फैसला देश की ‘नारी शक्ति’ के खिलाफ है।
विपक्ष की रणनीति पर उठे सवाल
गिरिराज सिंह के बयान के बाद विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं।
हालांकि विपक्षी दलों ने पहले इस बिल पर अलग-अलग कारणों से आपत्ति जताई थी।
इनमें परिसीमन और लागू होने की समयसीमा जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं।
क्या है महिला आरक्षण बिल?
महिला आरक्षण बिल का उद्देश्य संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करना है।
यह लंबे समय से चर्चा में रहा है और कई बार संसद में पेश किया जा चुका है।
हालांकि, अब तक यह पूरी तरह लागू नहीं हो सका है।
सियासत में बढ़ी बयानबाजी
इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।
जहां बीजेपी इसे महिला सशक्तिकरण से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष अपनी अलग दलीलें दे रहा है।
आने वाले समय में यह मुद्दा और बड़ा राजनीतिक विषय बन सकता है।
आगे क्या होगा?
बिल के पास न होने के बाद अब इसकी आगे की रणनीति पर नजर रहेगी।
संभावना है कि सरकार भविष्य में फिर से इसे पेश कर सकती है।
इस बीच, राजनीतिक दलों के बीच बहस जारी रहने की उम्मीद है।
निष्कर्ष: मुद्दा संवेदनशील, सियासत तेज
महिला आरक्षण बिल केवल एक विधायी प्रस्ताव नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बदलाव से जुड़ा मुद्दा है।
इसके पास न होने से जहां एक ओर निराशा है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
अब यह देखना अहम होगा कि भविष्य में इस पर क्या कदम उठाए जाते हैं।
Source: संसदीय कार्यवाही व सार्वजनिक बयान
