
असम चुनाव में “जस्टिस फॉर जुबीन” मुद्दा फिर चर्चा में है। छह महीने पहले सिंगापुर में रहस्यमयी हालात में गायक जुबीन गर्ग की मौत हुई थी। असम में हर जगह उनकी तस्वीरें दिखती हैं, लेकिन चुनावी बातचीत में यह मुद्दा उतना प्रमुख नहीं दिख रहा। “जस्टिस फॉर जुबीन” को लेकर लोगों की भावनाएं गहरी हैं, फिर भी वोटिंग व्यवहार में इसका असर साफ नहीं दिखता। यही वजह है कि “जस्टिस फॉर जुबीन” मुद्दा चर्चा में होने के बावजूद रहस्य बना हुआ है।
इस फैसले से लोगों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि क्या भावनात्मक मुद्दे वास्तव में चुनावी परिणाम बदलते हैं या नहीं।
‘जस्टिस फॉर जुबीन’ कितना बड़ा चुनावी मुद्दा?
असम में जहां भी जाएं, जुबीन गर्ग की तस्वीरें और गाने सुनाई देते हैं। लोग उन्हें आज भी याद करते हैं और न्याय की मांग कर रहे हैं।
हालांकि, जब वोटरों से चुनावी मुद्दों पर बात की जाती है, तो अधिकतर लोग विकास, महंगाई और रोजगार जैसे मुद्दों का जिक्र करते हैं। “जस्टिस फॉर जुबीन” पर भावनाएं तो हैं, लेकिन यह मुख्य चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है।
कुछ युवाओं ने जरूर सरकार के प्रति नाराजगी जताई है, जिससे संकेत मिलता है कि यह मुद्दा पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ है।
कांग्रेस vs बीजेपी—राजनीति तेज
कांग्रेस ने वादा किया है कि अगर उनकी सरकार बनती है, तो 100 दिनों के अंदर जुबीन को न्याय दिलाया जाएगा।
वहीं मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का कहना है कि इस मामले को राजनीति में लाना गलत है। उन्होंने साफ कहा कि मामला अदालत में है और कोर्ट को समयसीमा नहीं दी जा सकती।
कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने पलटवार करते हुए याद दिलाया कि पहले खुद सीएम ने कहा था कि अगर चुनाव से पहले न्याय नहीं मिला तो जनता बीजेपी को वोट न दे।
जांच पर कितना भरोसा?
जुबीन गर्ग की मौत को लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं। सिंगापुर की जांच में इसे हादसा बताया गया, लेकिन असम में कई लोग साजिश की आशंका जताते हैं।
राज्य सरकार ने इस मामले में तेजी लाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाया है। साथ ही एसआईटी भी जांच कर रही है और सात लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।
जुबीन के करीबी दोस्तों का कहना है कि वीडियो देखने पर यह हादसा लगता है, लेकिन सहयोगियों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। वे जांच प्रक्रिया पर भरोसा जताते हैं।
जोरहाट में क्या सोचते हैं जुबीन के करीबी?
जुबीन गर्ग का संबंध जोरहाट से था, जहां उनके बचपन और करियर की शुरुआत हुई।
उनके दोस्तों का कहना है कि जुबीन सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में बसने वाले इंसान थे। वे मानते हैं कि उन्हें न्याय जरूर मिलेगा, लेकिन इसे चुनावी मुद्दा बनाना सही नहीं है।
उनके अनुसार, जनता न्याय का इंतजार कर रही है, लेकिन चुनाव में लोग अपने रोजमर्रा के मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
चुनाव पर असर—अब भी रहस्य
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि “जस्टिस फॉर जुबीन” एक अंडरकरंट बन सकता है, जिससे सत्तारूढ़ पार्टी को नुकसान हो सकता है।
लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा स्पष्ट नहीं दिखता। लोग भावनात्मक रूप से जुड़े जरूर हैं, लेकिन वोट देते समय वे विकास और आर्थिक मुद्दों को अधिक महत्व दे रहे हैं।
इससे यह साफ होता है कि भावनात्मक मुद्दे हमेशा चुनावी नतीजों को प्रभावित नहीं करते।
जनता की भावनाएं बनाम वोटिंग पैटर्न
असम में जुबीन गर्ग को लेकर लोगों के मन में गहरा लगाव है। रोजाना लोग उनके अंतिम संस्कार स्थल पर श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।
लेकिन यही भावना वोटिंग के समय निर्णायक कारक नहीं बन रही। यह अंतर राजनीतिक दलों के लिए भी एक अहम संकेत है।
इस पूरे घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि जनता भावनात्मक और व्यावहारिक फैसलों में फर्क करती है।
Source: NDTV रिपोर्ट (आधारित)