अहम खबर: बिहार राज्यसभा चुनाव में 5वीं सीट पर सियासी संग्राम तेज

 


 बिहार राज्यसभा चुनाव में 5वीं सीट पर सियासी संग्राम तेज

बिहार राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। 16 मार्च को होने वाले बिहार राज्यसभा चुनाव में पांच सीटों के लिए मतदान होना है। पटना में एनडीए और महागठबंधन दोनों ही पांचवीं सीट को लेकर पूरी ताकत झोंक रहे हैं। भाजपा और जदयू के चार उम्मीदवारों की जीत लगभग तय मानी जा रही है, लेकिन पांचवीं सीट पर मुकाबला बेहद रोचक हो गया है। इसी बीच भाजपा ने दावा किया है कि एनडीए के सभी पांच उम्मीदवार जीतेंगे, जबकि आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भी अपनी रणनीति को मजबूत बताते हुए जीत का भरोसा जताया है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह चुनाव केवल राज्यसभा सीट का नहीं, बल्कि बिहार की मौजूदा राजनीतिक ताकत का भी परीक्षण माना जा रहा है।


NDA का दावा: पांचों सीटें जीतेंगे

बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने राज्यसभा चुनाव को लेकर एनडीए की स्थिति मजबूत बताई है।

उन्होंने कहा कि एनडीए ने पांच उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं और सभी की जीत तय है। भाजपा के अनुसार उनके उम्मीदवारों में पार्टी नेतृत्व और सहयोगी दलों के प्रमुख नेता शामिल हैं।

संजय सरावगी ने तंज कसते हुए कहा कि विपक्ष चाहे जितनी बैठकें कर ले, लेकिन चुनाव के परिणाम में एनडीए की जीत ही होगी।

उन्होंने कहा कि 16 मार्च की शाम तक बिहार से एनडीए के सभी पांच उम्मीदवार राज्यसभा पहुंचेंगे।


किन उम्मीदवारों के नाम चर्चा में

एनडीए की ओर से जिन नेताओं को उम्मीदवार बनाया गया है, उनमें कई बड़े नाम शामिल हैं।

इनमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा, केंद्रीय राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर और अन्य नेताओं के नाम सामने आए हैं।

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि इस चुनाव के जरिए कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नेताओं की राजनीतिक स्थिति मजबूत हो सकती है।

इसी कारण इस बार राज्यसभा चुनाव को लेकर दिलचस्पी काफी बढ़ गई है।


क्यों अहम बन गई पांचवीं सीट

बिहार की पांचवीं राज्यसभा सीट इस चुनाव की सबसे बड़ी चर्चा बन गई है।

चार सीटों पर एनडीए की जीत लगभग तय मानी जा रही है। लेकिन पांचवीं सीट पर मुकाबला एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधा हो गया है।

महागठबंधन की ओर से राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार अमरेंद्र धारी सिंह मैदान में हैं। दूसरी ओर एनडीए की तरफ से उपेंद्र कुशवाहा इस सीट के प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं।

इस वजह से पांचवीं सीट का चुनाव पूरी तरह नंबर गेम पर निर्भर हो गया है।


संख्या बल का गणित क्या कहता है

राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए विधायकों का समर्थन निर्णायक होता है।

एनडीए को इस सीट पर जीत के लिए अपने मौजूदा संख्या बल के अलावा तीन अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत बताई जा रही है।

दूसरी ओर महागठबंधन को अपने 35 विधायकों के साथ-साथ छह और विधायकों का समर्थन चाहिए।

इसी कारण दोनों पक्ष लगातार रणनीति बनाने और समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं।


तेजस्वी यादव की रणनीति और बैठक

राजद नेता और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस चुनाव को लेकर अपने सहयोगी दलों के साथ बैठक की।

पटना में हुई इस बैठक के बाद उन्होंने कहा कि महागठबंधन की रणनीति मजबूत है और चुनाव में जीत हासिल की जा सकती है।

तेजस्वी यादव ने कहा कि सभी सहयोगी दलों से बातचीत की जा रही है और परिणाम सकारात्मक रहने की उम्मीद है।

जब उनसे पूछा गया कि जीत के लिए जरूरी संख्या बल कहां से आएगा, तो उन्होंने जवाब दिया कि “संख्या बल है तभी तो चुनाव लड़ रहे हैं।”


छोटे दलों की भूमिका हो सकती है निर्णायक

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में छोटे दलों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।

एआईएमआईएम के पास पांच विधायक हैं और बहुजन समाज पार्टी के पास एक विधायक है। यदि इनका समर्थन किसी एक पक्ष को मिल जाता है, तो चुनाव का परिणाम बदल सकता है।

इसी वजह से दोनों गठबंधन इन दलों के साथ संपर्क बनाए हुए हैं।

सूत्रों के अनुसार दोनों पक्ष इन विधायकों का समर्थन पाने की कोशिश कर रहे हैं।


ओवैसी की पार्टी के रुख पर नजर

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के विधायकों का रुख इस चुनाव में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अभी तक पार्टी ने सार्वजनिक रूप से किसी उम्मीदवार का समर्थन घोषित नहीं किया है।

बताया जा रहा है कि ओवैसी ने अपने विधायकों को फिलहाल इंतजार करने की सलाह दी है।

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार तेजस्वी यादव और उपेंद्र कुशवाहा दोनों ने उनसे संपर्क साधा है।

इसलिए अंतिम फैसला उनके विधायकों के मतदान पर निर्भर हो सकता है।


16 मार्च को होगा मतदान

बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए मतदान 16 मार्च को होगा।

मतदान के बाद उसी दिन शाम तक परिणाम भी स्पष्ट हो सकते हैं।

राजनीतिक दलों के लिए यह चुनाव केवल एक संसदीय सीट का नहीं बल्कि राज्य की राजनीतिक ताकत दिखाने का भी मौका माना जा रहा है।

इसी कारण चुनाव से पहले सियासी बयानबाजी और रणनीतिक बैठकों का दौर तेज हो गया है।


Source: राजनीतिक दलों के बयान और विधानसभा से जुड़े आंकड़े

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