पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने अपनी सुरक्षा हटाए जाने पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पप्पू यादव सुरक्षा हटाने के फैसले को लेकर उन्होंने सरकार पर निशाना साधा और कहा कि उनकी जान को खतरा है। यह मामला बिहार में सामने आया है, जहां 6 फरवरी 2026 की गिरफ्तारी के बाद घटनाक्रम तेज हुआ। पप्पू यादव का दावा है कि सरकार ने अचानक सुरक्षा हटाई, जबकि मामला अदालत में विचाराधीन है। अब वे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों में कानूनी लड़ाई लड़ने की बात कह रहे हैं।
उन्होंने कहा कि बार-बार सुरक्षा हटाना संदेह पैदा करता है और इससे उनकी जान को खतरा बढ़ सकता है।
सुरक्षा हटाने पर क्या बोले पप्पू यादव?
निर्दलीय सांसद Pappu Yadav ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्हें पहले से Y श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई थी। उनके अनुसार, पहले मधेपुरा से सुरक्षा हटाई गई, फिर पूर्णिया में तैनात तीन एसएलआर गार्ड हटाए गए और अब बीएमपी सुरक्षा भी वापस ले ली गई।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम अपराधियों को खुला संकेत देने जैसा है।
उनका कहना है कि सुरक्षा हटाने का फैसला अचानक लिया गया और बिना स्पष्ट कारण बताए लागू कर दिया गया।
हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का रुख
पप्पू यादव ने बताया कि वे इस मामले को लेकर हाई कोर्ट पहुंच चुके हैं और बहस भी हो चुकी है। अब वे सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि वे सदन में गृहमंत्री से मुलाकात करेंगे और स्पीकर से भी इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं।
इस फैसले से लोगों को यह संदेश मिल रहा है कि सुरक्षा जैसे संवेदनशील मामलों में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। खासकर तब, जब मामला किसी जनप्रतिनिधि से जुड़ा हो।
6 फरवरी की गिरफ्तारी से शुरू हुआ विवाद
गौरतलब है कि 6 फरवरी 2026 को पप्पू यादव को पटना स्थित उनके आवास से गिरफ्तार किया गया था। यह कार्रवाई 31 साल पुराने गर्दनीबाग थाने में दर्ज मामले के सिलसिले में हुई थी।
गिरफ्तारी के दौरान उनके समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किया था। पुलिस और समर्थकों के बीच बहस भी हुई। बाद में उनके खिलाफ एक और मामला दर्ज किया गया।
स्वास्थ्य खराब होने के बाद उन्हें IGIMS और फिर पीएमसीएच ले जाया गया। मेडिकल जांच के बाद उन्हें बेऊर जेल भेजा गया।
10 फरवरी को अदालत ने उन्हें जमानत दे दी। एमपी-एमएलए कोर्ट में पेशी के दौरान वे व्हीलचेयर पर नजर आए थे।
सुरक्षा विवाद क्यों बना अहम मुद्दा?
सुरक्षा हटाने का मुद्दा इसलिए अहम हो गया है क्योंकि यह सीधे एक निर्वाचित सांसद की व्यक्तिगत सुरक्षा से जुड़ा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुरक्षा का आकलन खुफिया रिपोर्ट और खतरे के स्तर के आधार पर किया जाता है। ऐसे में अगर सुरक्षा हटाई जाती है, तो उसके पीछे ठोस प्रशासनिक कारण होने चाहिए।
पप्पू यादव का कहना है कि उनकी राजनीतिक सक्रियता और पुराने मामलों को देखते हुए उन्हें खतरा है। हालांकि प्रशासन की ओर से अभी तक विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
आम जनता पर क्या असर?
यह मामला केवल एक नेता की सुरक्षा तक सीमित नहीं है।
इस फैसले से लोगों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा व्यवस्था कैसे तय होती है और उसमें पारदर्शिता कितनी है।
अगर सुरक्षा जैसे मामलों में स्पष्टता नहीं होगी, तो इससे राजनीतिक माहौल में अविश्वास बढ़ सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
अब नजर अदालत की सुनवाई और सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया पर टिकी है।
अगर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल होती है, तो यह मामला और बड़ा कानूनी मोड़ ले सकता है।
राजनीतिक हलकों में भी इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है। आने वाले दिनों में यह विवाद और तूल पकड़ सकता है।
Source: मीडिया रिपोर्ट्स और सार्वजनिक बयान
