बिहार में बिहार शराबबंदी कानून को लेकर सियासी बयानबाज़ी तेज हो गई है। क्या—विधानसभा में शराब डिलीवरी का ‘सबूत’ देने का दावा, कब—बजट सत्र के आखिरी दिन 27 फरवरी को, कहां—पटना स्थित विधानसभा परिसर में, कौन—आरजेडी एमएलसी सुनील सिंह, क्यों—बिहार शराबबंदी कानून की प्रभावशीलता पर सवाल उठाने के लिए, और कैसे—खुलेआम डिलीवरी कराकर। इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है।
इस दावे ने कानून के क्रियान्वयन और जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या कहा सुनील सिंह ने?
आरजेडी नेता सुनील सिंह ने मीडिया से बातचीत में कहा कि बिहार में ऐसी कोई जगह नहीं है जहां पैसे देने पर शराब की डिलीवरी न हो सके।
उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि यदि सरकार को यकीन नहीं है, तो 27 तारीख को सदन के अंतिम दिन विधानसभा परिसर में ही शराब की डिलीवरी कराकर दिखा देंगे।
यह बयान सीधे तौर पर राज्य सरकार की शराबबंदी नीति पर सवाल उठाता है।
2016 से लागू है शराबबंदी कानून
बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून वर्ष 2016 में लागू किया गया था। इस कानून का उद्देश्य सामाजिक सुधार और नशामुक्ति था।
सुनील सिंह का दावा है कि 2016 से पहले जितनी शराब की खपत थी, उससे कई गुना अधिक अब अवैध रूप से हो रही है।
हालांकि सरकार लगातार कार्रवाई और जब्ती की जानकारी देती रही है।
सीमावर्ती राज्यों का हवाला
आरजेडी नेता ने कहा कि बिहार की सीमाएं उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड और नेपाल से लगती हैं।
इन राज्यों और देश में शराबबंदी लागू नहीं है, इसलिए तस्करी की संभावना बनी रहती है।
उनका तर्क है कि इतने बड़े भौगोलिक क्षेत्र में पूरी तरह रोक लगाना व्यवहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।
‘सूखे नशे’ की चिंता भी उठाई
सुनील सिंह ने यह भी कहा कि यदि किसी को शराब नहीं मिलती, तो वह अन्य प्रकार के नशे की ओर मुड़ सकता है।
उन्होंने युवाओं के भविष्य को लेकर चिंता जताई और कहा कि गलत नीतियों के कारण नई पीढ़ी प्रभावित हो रही है।
हालांकि इस विषय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की राय भिन्न है।
सरकार की नीति पर अप्रत्यक्ष निशाना
बयान के दौरान उन्होंने बिना नाम लिए मुख्यमंत्री आवास और आसपास के इलाकों का जिक्र किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि डिलीवरी पॉइंट्स हर जगह मौजूद हैं, लेकिन प्रशासन सख्ती का दावा करता है।
इन आरोपों पर सरकार की ओर से औपचारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।
आम जनता पर क्या असर?
शराबबंदी का मुद्दा बिहार में केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक भी है।
कई परिवारों का मानना है कि कानून से घरेलू हिंसा और आर्थिक बर्बादी में कमी आई है।
वहीं दूसरी ओर, अवैध तस्करी और काले बाजार की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
इस फैसले और बयानबाजी से लोगों को यह जानने की उत्सुकता है कि जमीनी सच्चाई क्या है।
यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो नीति की समीक्षा की मांग तेज हो सकती है।
विधानसभा सत्र के आखिरी दिन पर नजर
अब सबकी निगाह 27 फरवरी पर टिकी है, जब बजट सत्र का अंतिम दिन है।
क्या वाकई कोई ‘सबूत’ पेश होगा?
या यह केवल राजनीतिक बयान रहेगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में साफ हो सकते हैं।
क्यों बना यह मुद्दा इतना बड़ा?
बिहार में शराबबंदी कानून लंबे समय से राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है।
समर्थक इसे सामाजिक सुधार का कदम बताते हैं, जबकि आलोचक इसके क्रियान्वयन पर सवाल उठाते हैं।
ऐसे में विधानसभा में ‘डिलीवरी’ कराने की चुनौती ने इस बहस को और तीखा बना दिया है।
आगे क्या?
यदि विपक्ष अपने दावे को साबित करता है, तो सरकार पर दबाव बढ़ सकता है।
यदि ऐसा नहीं होता, तो यह मुद्दा राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह सकता है।
फिलहाल, बिहार शराबबंदी एक बार फिर राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गई है।
Source: आरजेडी नेता सुनील सिंह का सार्वजनिक बयान, बजट सत्र के दौरान मीडिया बातचीत
