पटना में 2026 की शुरुआत के साथ ही बिहार शराबबंदी कानून पर नई बहस छिड़ गई है। 2016 से लागू बिहार शराबबंदी को लेकर एनडीए के सहयोगी दलों ने समीक्षा की मांग उठाई है। सवाल है—क्या, कब, कहां और कैसे सरकार इसमें बदलाव करेगी? विधानमंडल में उठे मुद्दों, जहरीली शराब से मौतों, राजस्व घाटे और तस्करी के बढ़ते मामलों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। चर्चा है कि होली से पहले आंशिक ढील या संशोधन संभव है।
राजनीतिक गलियारों में इसे “बिरनी के खोते में हाथ” जैसा संवेदनशील मुद्दा बताया जा रहा है। सत्ता और विपक्ष दोनों की जुबान तेज है, लेकिन फैसला अभी बाकी है।
2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी: क्या बदला?
बिहार में अप्रैल 2016 में पूर्ण शराबबंदी लागू हुई थी। सरकार का तर्क था कि इससे सामाजिक सुधार होगा और महिला सुरक्षा मजबूत होगी।
सरकारी दावों के मुताबिक, शुरुआती दो-तीन वर्षों में घरेलू हिंसा और महिला उत्पीड़न के मामलों में 12 से 18% तक गिरावट दर्ज हुई। महिला हेल्पलाइन पर शिकायतें कम आईं।
इसी आधार पर सरकार ने इसे ऐतिहासिक निर्णय बताया।
लेकिन अब दस साल बाद सवाल उठ रहा है—क्या ये लाभ स्थायी रहे या शुरुआती असर तक सीमित थे?
राजस्व घाटा और तस्करी: आर्थिक दबाव कितना?
शराबबंदी से पहले 2015-16 में राज्य को उत्पाद शुल्क से लगभग 4500 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता था। शराबबंदी लागू होने के बाद यह आय लगभग शून्य हो गई।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि बढ़ते विकास खर्च और सामाजिक योजनाओं के बीच यह राजस्व घाटा सरकार के लिए चुनौती है।
सीमा पर 67 चेक पोस्ट और सीसीटीवी निगरानी के बावजूद तस्करी की घटनाएं सामने आती रहती हैं। पड़ोसी राज्यों से अवैध शराब की सप्लाई रोकना आसान नहीं रहा।
एनडीए के सहयोगी दलों—जिनमें जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी भी शामिल है—ने व्यापक समीक्षा की मांग रखी है।
जेलों में भीड़ और केसों का आंकड़ा
सदन में पेश आंकड़ों के अनुसार, 2016 से अब तक शराबबंदी के तहत करीब 10 लाख केस दर्ज हुए हैं। 16 लाख से अधिक गिरफ्तारियां हुईं।
इन आंकड़ों ने कानून के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े किए हैं। जेलों में भीड़ बढ़ने और न्यायिक प्रक्रिया पर बोझ की चर्चा भी हो रही है।
इसके साथ ही जहरीली शराब से मौतों की घटनाएं—जैसे छपरा कांड—ने कानून की प्रभावशीलता पर बहस तेज की है।
विशेषज्ञों का तर्क है कि जब शराब कानूनी रूप से बिकती थी, तब जहरीली शराब की घटनाएं अपेक्षाकृत कम थीं। अब अवैध निर्माण और माफिया नेटवर्क से जोखिम बढ़ा है।
क्या होली से पहले मिलेगी ढील?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के समीकरण बदल रहे हैं। एक ओर महिला वोट बैंक को बनाए रखने की चुनौती है, दूसरी ओर सहयोगी दलों को संतुष्ट करने का दबाव।
होली जैसे बड़े त्योहार से पहले आंशिक रियायत, जुर्माने में संशोधन या प्रवर्तन नीति में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, सरकार की ओर से अब तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन चर्चा तेज है और सियासी तापमान बढ़ा हुआ है।
आम जनता पर क्या असर?
अगर कानून में संशोधन होता है, तो इसका सीधा असर आम परिवारों, छोटे व्यापारियों और युवाओं पर पड़ेगा।
इस फैसले से लोगों को यह उम्मीद है कि जहरीली शराब से होने वाली मौतें रुकेंगी और अवैध तस्करी पर काबू मिलेगा।
वहीं, महिला सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता को लेकर चिंताएं भी बनी रहेंगी।
ग्रामीण इलाकों में जहां शराबबंदी को सामाजिक सुधार के रूप में देखा गया, वहां ढील का असर अलग हो सकता है। शहरी क्षेत्रों में राजस्व और नियंत्रण नीति पर बहस तेज होगी।
आगे की राह: समीक्षा या सख्ती?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार पूर्ण शराबबंदी को बरकरार रखेगी, आंशिक संशोधन करेगी या व्यापक समीक्षा के बाद नया ढांचा लाएगी?
राजनीतिक संकेत बताते हैं कि दबाव बढ़ रहा है। लेकिन अंतिम निर्णय संतुलन साधने वाला हो सकता है।
एक दशक पुराने इस कानून पर बहस केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक और आर्थिक भी है। आने वाले हफ्तों में स्थिति साफ हो सकती है।
Source: बिहार विधानसभा/विधान परिषद में उठी चर्चा और सरकारी प्रस्तुत आंकड़े
