25 June 1975 Emergency: भारतीय लोकतंत्र का काला दिन, जब संविधान और नागरिक अधिकारों पर लगा सबसे बड़ा ग्रहण

 



25 जून 1975—यह तारीख स्वतंत्र भारत के इतिहास में ‘काले दिन’ के रूप में दर्ज है। इसी दिन देश में पहली बार आंतरिक आपातकाल (Emergency) की घोषणा की गई थी। इस फैसले ने लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर गहरा असर डाला।

हालांकि 25 जून को भारत की 1983 विश्व कप जीत के लिए भी याद किया जाता है, लेकिन इस लेख में बात उस दौर की है, जब लोकतंत्र पर सबसे बड़ा संकट आया।

जब लगा आपातकाल

25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में आपातकाल लागू कर दिया।
इसके बाद:

  • विपक्षी नेताओं को रातोंरात गिरफ्तार किया गया
  • प्रेस और मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी गई
  • नागरिक स्वतंत्रताओं पर रोक लगाई गई
  • हजारों लोगों की जबरन नसबंदी करवाई गई

🗳️ चुनावी जीत, जो हार में बदल गई

1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ भारी बहुमत हासिल किया। इंदिरा गांधी ने अपने प्रतिद्वंद्वी राज नारायण को हराया।
लेकिन चुनाव के बाद आरोप लगे कि:

  • सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग हुआ
  • सरकारी कर्मचारियों से चुनाव प्रचार कराया गया
  • सरकारी संसाधनों का गलत इस्तेमाल किया गया

राज नारायण ने चुनाव को अदालत में चुनौती दी।

⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया और उन्हें 6 साल तक चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां 24 जून 1975 को जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

हालांकि:

  • इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति दी गई
  • लेकिन सांसद के अधिकार और वोट देने का हक छीन लिया गया

🧠 इस्तीफे की जगह आपातकाल का रास्ता

ऐसे हालात में इस्तीफा देना स्वाभाविक विकल्प था। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी इस्तीफा देना चाहती थीं, लेकिन उनके बेटे संजय गांधी ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।
लेखक जेवियर मोरो की किताब The Red Sari के अनुसार, संजय गांधी ने कहा:

“अगर आपने इस्तीफा दिया, तो विपक्ष आपको जेल में डाल देगा।”

🔥 जेपी आंदोलन और बढ़ता विरोध

देशभर में जयप्रकाश नारायण (JP) के नेतृत्व में सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज हो चुका था।
25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की विशाल रैली प्रस्तावित थी।
इंटेलिजेंस ब्यूरो से कथित विद्रोह की रिपोर्ट मिलने के बाद, बिना कैबिनेट बैठक किए आपातकाल की घोषणा कर दी गई।

⛓️ 21 महीने तक देश पर इमरजेंसी

आपातकाल 25 जून 1975 से मार्च 1977 तक चला—करीब 21 महीने
इस दौरान:

  • जेपी, अटल बिहारी वाजपेयी, मोरारजी देसाई, लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं को जेल में डाला गया
  • विरोध की हर आवाज दबा दी गई
  • प्रेस स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई
  • विपक्षी नेताओं की सूची बनाकर गिरफ्तारी हुई
  • जयपुर और ग्वालियर की राजमाताओं तक को तिहाड़ जेल भेजा गया

🧾 लोकतंत्र पर गहरा असर

आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय माना जाता है।
इस दौर ने यह सिखाया कि:

  • लोकतंत्र को सजग नागरिक ही बचा सकते हैं
  • सत्ता पर अंकुश जरूरी है
  • संविधान सर्वोपरि है

📌 निष्कर्ष

25 जून 1975 सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए चेतावनी है।
यह दिन याद दिलाता है कि जब सत्ता निरंकुश होती है, तो नागरिक अधिकार कितनी आसानी से छीन लिए जाते हैं।


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