सुप्रीम कोर्ट की रोक ने बिहार की सियासत में पिछड़ावाद की आग पर पानी फेर दिया। जिस मुद्दे से राजद को 100 में 60 पाने की उम्मीद थी, वही रणनीति अचानक फेल क्यों हो गई?
पटना: सुप्रीम कोर्ट की रोक और बदली सियासी चाल
यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगते ही बिहार की राजनीति में एक बड़ा सियासी मोड़ आ गया। इस फैसले ने न सिर्फ पिछड़ावाद की राजनीति को ब्रेक लगाया, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की उस रणनीति को भी झटका दे दिया, जिसके सहारे वह बिहार की राजनीति को एक बार फिर ‘मंडल युग’ की ओर ले जाना चाहती थी।
एनडीए की लगातार मजबूत होती स्थिति से परेशान राजद ने यूजीसी के नए नियमों को एक ऐसे राजनीतिक हथियार के रूप में देखा था, जिससे बिखरे हुए पिछड़े वोट बैंक को फिर से एकजुट किया जा सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की रोक ने इस पूरे सियासी प्रयोग को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया।
🔥 सामाजिक न्याय बनाम पिछड़ावाद की राजनीति
बिहार की राजनीति में पिछड़ावाद कोई नया शब्द नहीं है।
कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने का रास्ता भी इसी राजनीति से होकर गया।
- कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण से शुरू हुआ प्रयोग
- लालू प्रसाद यादव के दौर में ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर चरम
- और फिर नीतीश कुमार के अलग होने से पिछड़ावाद का विभाजन
यहीं से राजनीति दो धड़ों में बंट गई—
एक तरफ यादव डॉमिनेंस, दूसरी तरफ कुर्मी-कुशवाहा नेतृत्व, जिसे बीजेपी का साथ मिला। यही वह मोड़ था, जहां से एनडीए की सत्ता यात्रा शुरू हुई।
🧨 यूजीसी के नए निर्देश से क्यों गरमाई सियासत?
यूजीसी के नए निर्देशों में उच्च शिक्षण संस्थानों में
- जाति आधारित भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा
- और उसे रोकने के लिए इक्विटी कमेटियों का गठन
सबसे अहम बात यह थी कि इन कमेटियों में
👉 केवल SC, ST और OBC वर्ग के प्रतिनिधित्व की बात कही गई।
यहीं से समाज एक बार फिर
अगड़ा बनाम पिछड़ा की बहस में उलझ गया।
🤫 चुप रही बीजेपी-कांग्रेस, सड़कों पर उतरी RJD
जिस पार्टी का आधार सवर्ण वोट है, उसने हालात की नजाकत को समझते हुए चुप्पी साध ली।
इस चुप्पी में शामिल थे—
- भाजपा
- एनडीए के सहयोगी दल
- और रणनीतिक तौर पर कांग्रेस भी
लेकिन राजद ने इस मौके को गंवाया नहीं।
उसके नेता, प्रवक्ता और रणनीतिकार खुलकर मैदान में उतर आए और खुद को
👉 पिछड़ों का सबसे बड़ा पैरोकार
के रूप में पेश करने लगे।
🤔 मोदी समर्थन में क्यों दिखी RJD?
चुनावी हार के बाद राजद की राजनीति एक तरह के ठहराव में थी।
यूजीसी के नए नियमों ने उस शून्य को भर दिया।
दिलचस्प बात यह रही कि
👉 मोदी सरकार के फैसले के समर्थन में राजद के सुर सुनाई देने लगे।
यह समर्थन दरअसल मोदी का नहीं, बल्कि उस पिछड़ावादी एजेंडे का था, जिसे राजद नए सिरे से जिंदा करना चाहती थी।
🎯 राजद का ‘100 में 60’ वाला गणित
राजद की रणनीति साफ थी—
- मंडल दौर की राजनीति को फिर जीवित करना
- नीतीश कुमार के हिस्से गए पिछड़े वोट बैंक में सेंध लगाना
- और भाजपा-जदयू की चुप्पी के बीच खुद को विकल्प के रूप में पेश करना
लेकिन सुप्रीम कोर्ट की रोक ने इस आंदोलन पर
👉 असमय तुषारापात कर दिया।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट की रोक से क्यों झुंझलाया राजद?
इस फैसले से राजद को
- सिर्फ आंदोलन ही नहीं,
- बल्कि एक पूरा राजनीतिक नैरेटिव हाथ से निकलता दिख रहा है।
यही वजह है कि पार्टी के भीतर
👉 नाराजगी
👉 बेचैनी
👉 और रणनीतिक असमंजस
खुलकर नजर आने लगा है।
