पटना। बिहार की राजनीति हमेशा से उतार-चढ़ाव और गठबंधन के खेल के लिए जानी जाती रही है। यहां सत्ता का खेल कई बार ऐसा रहा कि सरकारें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं। इसी सियासी उठापटक के कारण बिहार को ऐसे कई मुख्यमंत्री मिले, जो सीएम की कुर्सी पर 100 दिन भी पूरे नहीं कर सके।
दिलचस्प बात यह है कि इस सूची में सिर्फ छोटे दलों के नेता ही नहीं, बल्कि नीतीश कुमार जैसे दिग्गज नेता का नाम भी शामिल है। आइए जानते हैं बिहार के उन पांच मुख्यमंत्रियों के बारे में, जिनका कार्यकाल बेहद छोटा रहा।
1. डॉ. जगन्नाथ मिश्रा: 94 दिन
इस सूची में पहला नाम है बिहार की राजनीति के दिग्गज नेता डॉ. जगन्नाथ मिश्रा का।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंदिरा) की ओर से मुख्यमंत्री बने जगन्नाथ मिश्रा ने
6 दिसंबर 1989 को पद संभाला था, लेकिन
10 मार्च 1990 को उनकी सरकार गिर गई।
👉 कुल कार्यकाल: 94 दिन
वह ‘शतक’ लगाने से महज 6 दिन चूक गए।
2. बीपी मंडल: सिर्फ 30 दिन
मंडल आयोग के जनक के रूप में देशभर में चर्चित बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल भी कम समय तक मुख्यमंत्री रहने वालों में शामिल हैं।
वाराणसी में जन्मे बीपी मंडल ने निर्दलीय मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता संभाली।
- शपथ: 1 फरवरी 1968
- इस्तीफा: 2 मार्च 1968
👉 कुल कार्यकाल: 30 दिन
3. भोला पासवान शास्त्री: 99 दिन और फिर 12 दिन
बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री का नाम एक अनोखे रिकॉर्ड के साथ जुड़ा है। वे नीतीश कुमार के बाद तीन बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नेताओं में शामिल रहे।
- 1968 में पहला कार्यकाल: 99 दिन
- 1969 में दूसरा कार्यकाल: सिर्फ 12 दिन
👉 दोनों बार उनका कार्यकाल बेहद छोटा रहा और सत्ता ज्यादा दिन टिक नहीं सकी।
4. सतीश प्रसाद सिंह: सिर्फ 5 दिन
बिहार के सियासी इतिहास में सबसे कम समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड
शोषित दल के नेता सतीश प्रसाद सिंह के नाम दर्ज है।
- शपथ: 28 जनवरी 1968
- इस्तीफा: 1 फरवरी 1968
👉 कुल कार्यकाल: 5 दिन
इतिहास में दर्ज हुआ बिहार का सबसे छोटा मुख्यमंत्री कार्यकाल।
5. नीतीश कुमार: 7 दिन
आज ‘सुशासन बाबू’ के नाम से पहचाने जाने वाले नीतीश कुमार भले ही बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड रखते हों, लेकिन उनके राजनीतिक करियर में एक बेहद छोटा कार्यकाल भी दर्ज है।
- शपथ: 3 मार्च 2000
- इस्तीफा: 10 मार्च 2000
👉 बहुमत साबित न कर पाने के कारण
👉 कुल कार्यकाल: 7 दिन
बिहार की सियासत का सबक
बिहार की राजनीति यह बताती है कि यहां कुर्सी स्थायी नहीं, समीकरण स्थायी होते हैं।
कई बार बड़े नाम भी बहुमत के खेल में मात खा गए और मुख्यमंत्री पद कुछ ही दिनों में हाथ से निकल गया।

