पटना गर्ल्स हॉस्टल मामला इन दिनों बिहार पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। चित्रगुप्त नगर थाना क्षेत्र में स्थित शंभू गर्ल्स हॉस्टल में एक छात्रा की संदिग्ध मौत के बाद पुलिस की भूमिका लगातार आलोचना के घेरे में है। खास तौर पर थाना इंचार्ज रोशनी कुमारी के फैसलों और जांच के तरीके को लेकर परिजन और स्थानीय लोग नाराज़ हैं।
6 जनवरी की घटना, 9 जनवरी तक खामोशी
जानकारी के अनुसार, 6 जनवरी को छात्रा को बेहोशी की हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसी दिन अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को सूचना दे दी थी। इसके बावजूद अगले 72 घंटों तक पुलिस की ओर से कोई सक्रिय कार्रवाई नहीं की गई।
परिजनों का आरोप है कि इस दौरान न तो छात्रा का बयान लिया गया और न ही घटनास्थल की गंभीरता से जांच की गई।
महिला अधिकारी होने के बावजूद नहीं दिखाई संवेदनशीलता
परिवार का कहना है कि एक महिला थाना प्रभारी होने के नाते रोशनी कुमारी से सहानुभूति और तत्परता की उम्मीद थी, लेकिन तीन दिनों तक पीड़िता से बातचीत तक नहीं की गई। 9 जनवरी को जब छात्रा की हालत गंभीर हो गई और एक डॉक्टर ने परिजनों को आशंका जताई कि “कुछ गलत हुआ है”, तब जाकर एफआईआर दर्ज कराई गई।
पुलिस नहीं, प्राइवेट ड्राइवर पहुंचा हॉस्टल!
मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू तब सामने आया जब यह खुलासा हुआ कि थाना इंचार्ज खुद घटनास्थल पर नहीं गईं, बल्कि अपने निजी ड्राइवर को हॉस्टल भेज दिया।
एक स्टिंग में ड्राइवर ने दावा किया कि मैडम को हॉस्टल का सही पता नहीं था, इसलिए उसे सीसीटीवी फुटेज और डीवीआर (DVR) लाने के लिए भेजा गया।
यह सवाल बेहद गंभीर है कि:
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क्या किसी निजी व्यक्ति को डिजिटल सबूत जब्त करने का अधिकार है?
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72 घंटे बाद सीसीटीवी फुटेज कितनी सुरक्षित रह सकती है?
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क्या इस दौरान सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना नहीं है?
पुलिस की ‘सुसाइड थ्योरी’ पर सवाल
छात्रा की 11 जनवरी को मौत के बाद पुलिस पर दबाव बढ़ा। 12 जनवरी को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुलिस अधिकारियों ने दावा किया कि कमरे से नींद की गोलियां मिली हैं और यह आत्महत्या का मामला हो सकता है।
हालांकि परिजनों का कहना है कि:
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अगर यह आत्महत्या थी, तो शरीर पर चोट के निशान क्यों थे?
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बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट के पुलिस ने आत्महत्या की थ्योरी क्यों तय कर ली?
सबूतों से छेड़छाड़ का शक
स्थानीय लोगों और परिवार का आरोप है कि पुलिस और हॉस्टल प्रबंधन के बीच सांठगांठ हो सकती है।
इन बिंदुओं ने शक को और गहरा किया:
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72 घंटे के भीतर कमरे की सफाई
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डीवीआर को पुलिस के बजाय एक निजी ड्राइवर द्वारा जब्त करना
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शुरुआती जांच में लगातार देरी
अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति को बचाने के लिए जानबूझकर जांच को कमजोर किया गया?
बढ़ता दबाव, जांच पर निगाह
जैसे-जैसे मामला तूल पकड़ रहा है, वैसे-वैसे बिहार पुलिस की निष्पक्षता और पेशेवर रवैये पर सवाल बढ़ते जा रहे हैं। परिजन निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
