रोहिणी आचार्य का सम्राट सरकार से सवाल, बाढ़ में बर्बाद फसल की भरपाई कब?

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पटना: बिहार बाढ़ को लेकर राज्य में राहत और बचाव के साथ सियासी बयानबाजी भी तेज है। इसी बीच बिहार बाढ़ से किसानों की फसलों को हुए नुकसान का मुद्दा उठाते हुए लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने सरकार से सीधा सवाल किया है। सिंगापुर से एक्स पर पोस्ट करते हुए उन्होंने पूछा कि बाढ़ से बर्बाद हुई फसलों की भरपाई के लिए सरकार के पास कोई नया और व्यावहारिक प्लान है या नहीं। रोहिणी आचार्य ने कहा कि बिहार में हर साल बाढ़ आती है। इससे बड़ी मात्रा में खेतों में लगी फसल पानी में डूब जाती है और किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

रोहिणी आचार्य ने सरकार से क्या पूछा?

रोहिणी आचार्य ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में किसानों को मिलने वाली फसल क्षति सहायता को लेकर सवाल खड़े किए। उनका कहना है कि सरकार आपदा के बाद राहत और क्षतिपूर्ति देने का दावा करती है, लेकिन मौजूदा सहायता राशि किसानों के वास्तविक नुकसान की तुलना में काफी कम है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और प्राकृतिक आपदाओं से किसानों की पूरी फसल तक बर्बाद हो जाती है, तब मौजूदा आर्थिक सहायता उनके नुकसान की भरपाई कैसे कर सकती है?

रोहिणी ने इसी आधार पर सरकार से नई नीति और व्यावहारिक राहत व्यवस्था तैयार करने की मांग उठाई है।

फसल नुकसान पर कितनी सहायता का प्रावधान?

बिहार राज्य फसल सहायता योजना के तहत किसानों को बिना प्रीमियम के फसल नुकसान की स्थिति में आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, नुकसान की स्थिति के आधार पर किसानों को प्रति हेक्टेयर सहायता दी जाती है। वहीं प्राकृतिक आपदा से 33 प्रतिशत या उससे अधिक फसल नुकसान होने पर भी अलग-अलग श्रेणियों में आर्थिक मदद का प्रावधान है। असिंचित क्षेत्र में फसल नुकसान के लिए 8,500 रुपये प्रति हेक्टेयर, सिंचित क्षेत्र के लिए 17,000 रुपये और बहुवर्षीय फसलों के लिए 22,500 रुपये प्रति हेक्टेयर तक सहायता का प्रावधान बताया गया है। अधिकतम दो हेक्टेयर तक सहायता दिए जाने की व्यवस्था है। इसके अलावा फसल सहायता योजना के तहत नुकसान की स्थिति के अनुसार 7,500 रुपये और 10,000 रुपये प्रति हेक्टेयर तक सहायता राशि का भी प्रावधान है।

खेती की बढ़ती लागत पर भी उठे सवाल

रोहिणी आचार्य का तर्क है कि आज खेती की लागत पहले की तुलना में काफी बढ़ चुकी है। बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और कृषि से जुड़ी दूसरी लागतों में वृद्धि के बीच यदि पूरी फसल बर्बाद हो जाए तो सीमित सहायता से किसान का वास्तविक नुकसान पूरा करना मुश्किल है। उनका कहना है कि बाढ़ प्रभावित किसानों को सिर्फ तत्काल राहत देने के बजाय ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जिससे उन्हें लंबे समय तक आर्थिक सुरक्षा मिल सके। बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ के कारण बड़ी संख्या में किसान प्रभावित होते हैं। ऐसे में फसल क्षति के आकलन और सहायता राशि को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

सर्वे और सत्यापन प्रक्रिया पर भी निशाना

रोहिणी आचार्य ने फसल नुकसान के सर्वेक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। उनका आरोप है कि कागजी औपचारिकताओं और प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी के कारण कई वास्तविक किसान समय पर सहायता नहीं हासिल कर पाते हैं। उन्होंने खास तौर पर गैर-रैयत यानी बटाईदार किसानों की स्थिति का मुद्दा उठाया। ऐसे किसानों के पास अपनी जमीन नहीं होती, लेकिन वे खेतों में मेहनत करके फसल उगाते हैं। फसल बर्बाद होने पर उन्हें भी सीधे आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। रोहिणी के मुताबिक, राहत व्यवस्था में ऐसे किसानों को भी प्रभावी तरीके से शामिल करने की जरूरत है।

बिहार में 46 लाख से ज्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित

बिहार में इस समय बाढ़ का असर कई जिलों में देखने को मिल रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राज्य के 15 जिलों में 46 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हैं। सरकार की ओर से राहत और बचाव अभियान चलाने की बात कही जा रही है। प्रभावित क्षेत्रों में लोगों तक भोजन, आवश्यक सामग्री और दूसरी राहत सुविधाएं पहुंचाने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, बाढ़ से खेतों में हुए नुकसान ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। पानी घटने के बाद भी किसानों के सामने बर्बाद फसल, दोबारा खेती की लागत और आय के संकट जैसी चुनौतियां रहेंगी।

क्या सरकार को बदलनी होगी राहत नीति?

रोहिणी आचार्य ने इसी मुद्दे को उठाते हुए सवाल किया है कि क्या सरकार की जिम्मेदारी केवल आपदा के बाद राहत राशि बांटने तक सीमित रहनी चाहिए या किसानों के लिए नई और व्यावहारिक नीति भी तैयार की जानी चाहिए। उनका कहना है कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में किसानों को मिलने वाली सहायता राशि को वास्तविक कृषि लागत और नुकसान के अनुरूप देखना जरूरी है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा में किसानों की आय और खेती दोनों प्रभावित होती हैं। इसलिए फसल नुकसान का तेज सर्वे, पारदर्शी सत्यापन और समय पर सहायता किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। फिलहाल रोहिणी आचार्य के इस सवाल पर सरकार की ओर से किसी नए फसल क्षतिपूर्ति प्लान की घोषणा की जानकारी सामने नहीं आई है। आने वाले दिनों में बाढ़ का पानी घटने के साथ फसल नुकसान का आकलन इस पूरे मुद्दे को और महत्वपूर्ण बना सकता है। 

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