आंगनबाड़ी में 27% बच्चों की कमी का राज, फर्जीवाड़े का बड़ा खेल

 


बिहार आंगनबाड़ी केंद्रों में पिछले तीन साल में बच्चों की संख्या में आई तेज गिरावट ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। बिहार आंगनबाड़ी केंद्रों में 27% बच्चों की कमी सिर्फ सामान्य बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़े फर्जीवाड़े का संकेत मानी जा रही है। नई तकनीक लागू होने के बाद जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

मार्च 2024 तक जहां 55 लाख से ज्यादा बच्चे पंजीकृत थे, वहीं मार्च 2026 में यह संख्या घटकर करीब 40 लाख रह गई। इस गिरावट के पीछे अब तकनीकी सत्यापन को मुख्य कारण माना जा रहा है।

फेस कैप्चरिंग सिस्टम से खुली पोल

राज्य में 2024 से सभी आंगनबाड़ी केंद्रों पर फेस कैप्चरिंग सिस्टम लागू किया गया। इस सिस्टम के तहत हर बच्चे की लाइव फोटो लेकर उसे पोषण ट्रैकर ऐप पर अपलोड करना अनिवार्य किया गया।

इस प्रक्रिया में बच्चों के चेहरे की पहचान डिजिटल डेटाबेस से मिलाई जाती है। सत्यापन के बाद ही उन्हें पोषाहार और अन्य योजनाओं का लाभ मिलता है।

जैसे ही यह सिस्टम लागू हुआ, पंजीकृत बच्चों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज होने लगी। इससे संकेत मिला कि पहले दर्ज आंकड़ों में गड़बड़ी थी।

फर्जी नामों का खेल कैसे चलता था

आईसीडीएस सूत्रों के अनुसार, कई आंगनबाड़ी केंद्रों में वास्तविक संख्या से अधिक बच्चों का पंजीकरण दिखाया जाता था। सेविकाओं द्वारा कुछ फर्जी या बेनामी नाम जोड़ दिए जाते थे।

इन नामों के आधार पर अतिरिक्त राशन और योजनाओं का लाभ लिया जाता था। लेकिन फेस कैप्चरिंग और आधार लिंकिंग के बाद यह फर्जीवाड़ा पकड़ में आने लगा।

अब हर बच्चे की पहचान और उपस्थिति का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है, जिससे गड़बड़ी की संभावना कम हो गई है।

आंकड़ों में बड़ा अंतर क्या कहता है

  • मार्च 2023: लगभग 51.72 लाख बच्चे पंजीकृत
  • मार्च 2024: बढ़कर 55.60 लाख
  • मार्च 2026: घटकर 40.35 लाख

इन आंकड़ों से साफ है कि सिस्टम लागू होने के बाद करीब 15 लाख बच्चों का अंतर सामने आया। यह अंतर केवल जनसंख्या बदलाव से नहीं समझाया जा सकता।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह वास्तविक लाभार्थियों की पहचान की प्रक्रिया का परिणाम है।

आधार लिंकिंग और लाइव फोटो से सख्ती

नई व्यवस्था के तहत हर पंजीकृत बच्चे का आधार नंबर लिंक किया गया है। इसके साथ ही फेस स्कैनिंग के जरिए पहचान सुनिश्चित की जाती है।

यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि:

  • केवल वास्तविक बच्चे ही सूची में शामिल हों
  • नियमित उपस्थिति की निगरानी हो
  • पोषाहार सही लाभार्थी तक पहुंचे

हर महीने इस डेटा की समीक्षा की जाती है, जिससे लगातार निगरानी बनी रहती है।

सिस्टम से पारदर्शिता बढ़ी, लेकिन सवाल भी

फेस कैप्चरिंग सिस्टम ने जहां फर्जीवाड़े पर लगाम लगाई है, वहीं कुछ नए सवाल भी खड़े किए हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी संसाधनों की कमी, इंटरनेट कनेक्टिविटी और प्रशिक्षण जैसे मुद्दे सामने आए हैं। कई जगहों पर सेविकाओं को नई प्रणाली अपनाने में दिक्कतें भी हुई हैं।

हालांकि, प्रशासन का मानना है कि लंबी अवधि में यह सिस्टम पारदर्शिता और दक्षता को मजबूत करेगा।

आगे क्या बदलेगा?

विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की डिजिटल निगरानी से भविष्य में:

  • योजनाओं का सही लाभार्थी चयन होगा
  • सरकारी खर्च में पारदर्शिता आएगी
  • डेटा आधारित नीति निर्माण संभव होगा

साथ ही, यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।


Source: विभागीय आंकड़े और आईसीडीएस सूत्र

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