Karpuri Thakur: दो बार मुख्यमंत्री बने कर्पूरी ठाकुर, लेकिन आरक्षण और राजनीति की उठापटक में अधूरा रह गया सत्ता का सफर

 


पटना। बिहार की राजनीति में कर्पूरी ठाकुर का नाम सामाजिक न्याय, पिछड़ों के अधिकार और सादगीपूर्ण राजनीति के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। वे बिहार के ऐसे नेता रहे जो दो बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन विडंबना यह रही कि एक भी बार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। पहली बार पार्टी के भीतर गुटबाजी और दूसरी बार आरक्षण के फैसले ने उनकी सरकार को गिरा दिया।

पहली बार मुख्यमंत्री बनने का कठिन रास्ता

दिसंबर 1970 में कर्पूरी ठाकुर पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। इससे पहले राज्य की राजनीति बेहद अस्थिर थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय के इस्तीफे के बाद सत्ता की दौड़ शुरू हुई। वरिष्ठ दलित नेता भोला पासवान शास्त्री भी मुख्यमंत्री बनना चाहते थे और उन्होंने कांग्रेस (इंदिरा गुट) के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश किया।

हालांकि राज्यपाल ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) के नेता कर्पूरी ठाकुर को सरकार बनाने का अवसर दिया। गठबंधन सरकार होने के कारण उन्हें मजबूरी में 52 सदस्यों की बड़ी मंत्रिपरिषद बनानी पड़ी। पार्टी के अंदर मतभेद और सहयोगी दलों की खींचतान के कारण यह सरकार ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी।

1977: सांसद बने, लेकिन फिर भी CM की कुर्सी तक पहुंचे

1977 में आपातकाल के बाद देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और जनता पार्टी का गठन हुआ। इसी साल कर्पूरी ठाकुर समस्तीपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। बिहार में उस समय कांग्रेस के जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री थे, लेकिन केंद्र में मोरारजी देसाई की सरकार बनने के बाद उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई।

इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी ने 324 में से 214 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया। मुख्यमंत्री पद के लिए कर्पूरी ठाकुर और बिहार जनता पार्टी के अध्यक्ष सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के बीच मुकाबला हुआ।

विधायक दल के चुनाव में बड़ी जीत

हालांकि कर्पूरी ठाकुर सांसद थे, फिर भी जनता पार्टी के अधिकांश विधायक उन्हें मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। विधायक दल के नेता के चुनाव में वोटिंग हुई, जिसमें—

  • कर्पूरी ठाकुर को 144 वोट
  • सत्येन्द्र नारायण सिन्हा को 84 वोट

मिले। इस तरह कर्पूरी ठाकुर दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने।

आरक्षण के फैसले से भड़की राजनीतिक आग

मुख्यमंत्री बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने सामाजिक न्याय को मजबूत करने के लिए सरकारी नौकरियों में 26 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। इसमें—

  • 20% पिछड़ा वर्ग
  • 3% महिलाएं
  • 3% आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण

को शामिल किया गया। यह फैसला उस दौर में बेहद साहसिक माना गया, लेकिन इसी ने उनकी सरकार के लिए मुश्किलें भी खड़ी कर दीं।

जनता पार्टी के भीतर अगड़े बनाम पिछड़े की राजनीति तेज हो गई। खासकर जनसंघ से जुड़े सवर्ण विधायक इस फैसले से नाराज हो गए और सरकार के खिलाफ माहौल बनने लगा।

प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भी थे असहमत

तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भी बिहार में आरक्षण लागू करने के पक्ष में नहीं थे। नवंबर 1978 में पटना के गांधी मैदान में एक सार्वजनिक सभा के दौरान उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण फैसले की आलोचना कर दी।

इसके बावजूद कर्पूरी ठाकुर अपने फैसले पर अडिग रहे और आरक्षण को लागू कर दिया। इसके बाद बिहार के कई हिस्सों में हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जिससे राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ गई।

अविश्वास प्रस्ताव और सरकार का पतन

राजनीतिक असंतोष के बीच अप्रैल 1979 में कर्पूरी ठाकुर सरकार के खिलाफ विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया।
19 अप्रैल 1979 को हुए मतदान में सरकार बहुमत साबित नहीं कर पाई और कर्पूरी ठाकुर को इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद रामसुंदर दास बिहार के मुख्यमंत्री बने।

अधूरा कार्यकाल, लेकिन अमिट विरासत

कर्पूरी ठाकुर भले ही अपने दोनों कार्यकाल पूरे नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने बिहार की राजनीति को सामाजिक न्याय की दिशा दी। पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष आज भी प्रासंगिक है। उनका आरक्षण मॉडल आगे चलकर कई सामाजिक आंदोलनों की प्रेरणा बना।

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