मधुश्रावणी पर्व शुरू: पति की लंबी उम्र के लिए 15 दिन करेंगी विशेष पूजा


 

दरभंगा: बिहार मधुश्रावणी पर्व मिथिलांचल की सबसे प्राचीन और आस्था से जुड़ी परंपराओं में से एक माना जाता है। बिहार मधुश्रावणी पर्व की शुरुआत सोमवार से श्रद्धा और उत्साह के साथ हो गई। नागपंचमी के शुभ अवसर पर शुरू होने वाला यह 15 दिवसीय अनुष्ठान विशेष रूप से नवविवाहित महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान महिलाएं पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की समृद्धि के लिए भगवान शिव, माता पार्वती और बिषहरी देवता की विधि-विधान से पूजा करती हैं।

मिथिलांचल के गांवों और शहरों में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। घर-घर पूजा की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो गए हैं।

क्या है मधुश्रावणी पर्व और क्यों है इसका विशेष महत्व?

मधुश्रावणी पर्व मिथिला की सदियों पुरानी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है।

यह पर्व श्रावण कृष्ण पक्ष पंचमी यानी नागपंचमी से शुरू होकर श्रावण शुक्ल पक्ष तृतीया तक चलता है।

इस दौरान नवविवाहित महिलाएं पूरे 15 दिनों तक सात्विक जीवन अपनाकर नियमित पूजा-पाठ करती हैं।

मान्यता है कि इस अनुष्ठान से दांपत्य जीवन में सुख, प्रेम और समृद्धि बनी रहती है तथा परिवार पर आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।

बिषहरी पूजा और लोक परंपराओं का अनूठा संगम

मधुश्रावणी पर्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बिषहरी देवता की पूजा मानी जाती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बिषहरी देवता की आराधना से परिवार की रक्षा होती है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

पूजा के दौरान महिलाएं पारंपरिक मैथिली लोकगीत गाती हैं और प्रतिदिन धार्मिक कथाओं का श्रवण करती हैं।

पूजा स्थल को रंग-बिरंगे फूलों से सजाया जाता है और सुंदर अरिपन बनाकर धार्मिक वातावरण तैयार किया जाता है।

नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ता है यह पर्व

मधुश्रावणी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

परिवार की बुजुर्ग महिलाएं नवविवाहिताओं को इस दौरान धार्मिक परंपराओं, पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक मूल्यों की जानकारी देती हैं।

इससे नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पारंपरिक जीवन मूल्यों से जुड़ी रहती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे पर्व सामाजिक एकता और पारिवारिक संबंधों को भी मजबूत बनाते हैं।

नवविवाहिताओं ने साझा किया अपना अनुभव

केवटी प्रखंड के लादारी गांव की नवविवाहिताओं प्रकृति, अंशु, नीतू, वर्षा, शीतल, नेहा और श्रुति ने बताया कि वे पूरे 15 दिनों तक सात्विक भोजन करेंगी।

वे प्रतिदिन फूल चुनकर भगवान की पूजा करती हैं, कथा सुनती हैं और पारंपरिक लोकगीत गाती हैं।

उनका कहना है कि इस पर्व के माध्यम से वे अपने पति की लंबी उम्र, सुखी वैवाहिक जीवन तथा मायके और ससुराल दोनों परिवारों की खुशहाली की कामना करती हैं।

यह अनुष्ठान उनके लिए केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव का भी प्रतीक है।

विशेषज्ञ ने बताया मधुश्रावणी का महत्व

धार्मिक विद्वान पंडित चंद्रमणि झा के अनुसार मधुश्रावणी पर्व मिथिला की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है।

उन्होंने कहा कि बदलते समय के बावजूद यह पर्व अपनी मूल परंपराओं को संजोए हुए है और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का कार्य कर रहा है।

उनके अनुसार इस पर्व के माध्यम से परिवारों में प्रेम, विश्वास और सामाजिक समरसता का संदेश भी मजबूत होता है।

आस्था और संस्कृति का जीवंत उत्सव

मधुश्रावणी पर्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है।

यह मिथिला की लोक परंपराओं, लोकगीतों, पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक एकता का भी उत्सव है।

हर वर्ष हजारों नवविवाहित महिलाएं पूरे श्रद्धाभाव से इस अनुष्ठान में भाग लेती हैं और अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाने का संकल्प लेती हैं।

इसी कारण यह पर्व आज भी मिथिलांचल की सांस्कृतिक पहचान और लोक आस्था का सबसे महत्वपूर्ण उत्सव माना जाता है।

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